Saturday, 28 April 2012

मैं अकेली नहीं हूं..


आज तनूजा के पाँव ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे | कारण कि आई
आई टी दिल्ली की टॉपर, अहमदाबाद में एम बी के आखरी
सेमिस्टर में थी कि उसकी नौकरी एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में
लग गयी| करियर पसंद तनूजा को तो मानों मुँहमांगी मुराद मिल
गयी| दुगने जोश के साथ उसने परीक्षा की तैयारी की और परीक्षा
समाप्त होते ही ट्रेनिंग के लिए उसे मुंबई भेज दिया गया| दो महीने 
पश्चात, पाँच अंकों के ऊंचे वेतन पर वह  मुंबई में ही काम करने 
लगी| पहले महीने तक, कंपनी की ओर से रहने की सुविधा मिली 
फिर कुछ समय तक पेइंग गेस्ट बन कर रही और बाद में तीन-चार 
सहकर्मियों ने दो कमरों का एक फ्लैट किराये पर ले लिया|

तनूजा को अपने काम में रूचि थी| समय पर ऑफिस पहुँचती और रोज का काम रोज ही निपटा लेती | फिर तरक्की होने में क्या देरी थी? उसे अब जगह-जगह भेजा जाने लगा- कभी चेन्नई, कभी बंगलोर, कभी जयपुर तो कभी बरोदा | पदोन्नति के साथ साथ अन्य सुविथायें भी बढ़ गयीं | दफ्तर आने-जाने के लिए शौफ़र ड्रिवन कार, रहने के लिए फ्लैट | वेतन में इजाफ़ा तो होना ही था|

तनूजा को काम का जैसे नशा लग गया | योग्यता, समर्पित भावना ईमानदारी को देख उसे और प्रोत्साहित किया गया | प्रोन्नति हुयी तो वो विदेश भेजी जाने लगी | हवाई जहाज़ में उड़ते हए महत्वाकांक्षा की दुनिया में भी सैर करने लगी, ऊंचे-ऊंचे रंगीन सपने बुनने लगी तनूजा|

प्राइवेट कंपनी में छुट्टियाँ कम मिलतीं, पर सन्डे तो अपना था | बीच-बीच में कभी कभी रजिस्टर्ड छुट्टियाँ मिल जातीं | तब तनूजा छुट्टियों का भरपूर आनंद उठाती और थकान दूर कर अगले हफ्ते के लिए तरो-ताज़ा हो जाती | मिलनसार स्वभाव की हँसमुख तनूजा के सखा-सहेलियों की भी कमी नहीं थी | किसी के साथ सिनेमा देखती, किसी के साथ समुद्र तट की सैर, तो किसी के संग शौपिंग करती | सहकर्मियों के घर बर्थडे पार्टी होती, डिनर होता तब तो जाती-ही-जाती | धीरे धीरे वह डांस पार्टी और सोशिअल में भी संकोच के साथ नहीं खुल कर शामिल होने लगी और यदि कहीं नहीं जाना तो उपन्यास पढ़ती, खत लिखती, फोन करती | कुछ नहीं तो अपना टी-वी और म्यूजिक तो था ही | देर देर तक सो कर और फालतू गप-शाप करके समय र्बाद करना उसका स्वभाव नहीं था | व्यस्त दिनचर्या के साथ तीन वर्ष कैसे बीत गए, तनूजा को पता ही नहीं चला|

साल में एक महीने के लिए सवेतन छुट्टी लेने का प्रावधान कंपनी में था | किन्तु एक बार में दो हफ्ते की छुट्टी ही ली जा सकती थी | विश्वस्त होने के कारण तनूजा को किसी किसी काम से विदेश भेजा जाता| उसे भी नए-नए देशों की सैर और नए अनुभवों का आकर्षण कम ना था अतः वह दो साल से घर नहीं जा पाई थी | माता-पिता और छोटी बहन अनुजा उससे मिलने बम्बई जाते, किन्तु इस बार उसके माँ-बाप का विशेष आग्रह था कि दीपावली वह घर पर सबके साथ मनाये|

तनूजा आई | माँ-बाप खुश, बहन खुश, अड़ोस-पड़ोस में सब खुश, वह खुद भी बहुत खुश | खूब उछलती कूदती, खूब खिलखिलाती, खूब हँसी-मजाक करती, और ऑफिस के तथा विदेशों के तरह-तरह के किस्से-कहानी सुनाती| सुनते-सुनते माँ ने उससे कुछ और सुनना चाहा | इस लिए एक दिन उन्होंने कहा , “ तनु! काम करते-करते तुझे तीन साल हो गए | जिंदगी में अब कुछ परिवर्तन नहीं लाना चाहती क्या?”
में यहाँ बहुत खुश हूं माँ! बॉस बहुत अच्छे हैं, संगी साथी बहुत सहयोग देते हैं, तरक्की की गुन्जायिश भी बहुत है| मैं नौकरी नहीं बदलना चाहती

मैं नौकरी बदलने के लिए थोड़ी कह रही हूं | मैं और तेरे पापा चाहते हैं कि अब तुझे शादी के विषय में सोचना चाहिए|माँ ने बड़ी भावुकता के साथ कहा|

शादी! मैं? नहीं माँ, अभी तो मेरे करियर की शुरुआत है, मुझे बहुत ऊंची बुलंदियों पर पहुँचना है! ”
वह तो होता ही रहेगा बेटा! यह काम भी ज़रूरी है | जो सही समय पर, सही उम्र में होना चाहिए
“ शादी के बारे में ना सोचा है, ना ही मैं अभी करना चाहती हूँ! मुझसे यह सब बातें ना करो माँ! ” बड़ी बेरुखी से कहा तनूजा ने |

तुमसे कहूँ तो और किससे कहूँ? क्यों नहीं करना चाहती शादी? " माँ ने आक्रोश के साथ कहा |
नहीं करना चाहती बस | शादी ज़रूरी है क्या? "

हाँ ज़रूरी है | यह जिंदगी की ज़रूरत है, समाज की मान्यता है | आज हम हैं पर हमेशा नहीं रहेंगे |
तब कोई तो हो अपना कहने के लिए, दुःख सुख में सहभागी बनने के लिए" बेटी के मनोभावों
को चेहरे पर पढ़ते हुए माँ ने कहा|    

“ तेरे लिए कई अच्छे रिश्ते आए हैं | देख तनु, हमने दो जगह जाँच-पड़ताल कर ली है, लड़कों से
मिल लिए हैं, सब बातें तय हो चुकीं हैं, बस तेरे हाँ करने की देर है |" तनु को सहमत करने के
लिए उसके कंधे थपथपाते हुए, पीठ सहलाते हुए माँ ने फिर कहा, " अच्छे परिवार हैं, अच्छे लड़के
हैं, तू उनसे मिल ले, फिर जिसे पसंद करेगी उसी के साथ तेरी"

ऐसे कैसे देख लूं, मिल लूं, पसंद कर लूं? " तनु फिर बिफ़र पड़ी | "जिसे जानती ही नहीं, पहचानती
नहीं, घंटे दो घंटे में उसे क्या देख लूंगी? "

“ हम लोग तो अच्छी तरह देख परख चुके हैं बेटी

शादी मुझे करनी है कि आपको? मेरी चिंता छोड़ दीजिए माँ! अपनी शादी मैं खुद करूंगी, अपनी पसंद से करूंगी और जब मन होगा तब करूंगी | सुना आपने? ” गुस्से में काँपते हुए तनु ने कहा | फिर थोड़ा सँभलते हुए धीमे स्वर में बोली,  "जिंदगी मेरी है, मुझे अपने ढंग से जीने का पूरा हक है

अब माँ का भी पारा चढ़ गया, “तेरे मुँह में लगाम है कि नहीं? जो जी में आया बके जा रही है? ये क्यों भूल जाती है कि तुझे यह जिंदगी हमने दी है, हमने! "

हाँ, तो क्या करेंगी? मुझे किसी के भी पल्ले बाँध देंगी? ठीक है, कर दीजिए शादी! मैं घर से भाग जाऊंगी, नहीं तो तलाक दे दूँगी, डूब मरूंगी, ज़हर खा लूंगी |भावावेश में तनु रोने लगी | अनु माँ की तरफ बोल सकती थी बहिन का पक्ष ले सकती थी | चुपचाप आकर दोनों के बीच में खड़ी हो गयी| तनु के पिता कमरे से बाहर गए |

 “ हम कोई ज़बरदस्ती नहीं कर रहे, बेटा! तेरी मर्ज़ी नहीं तो थोड़े दिनों बाद सही उन्होंने प्यार से पुचकार कर तनु के आँसू पोछे, फिर कुछ सोचते हुए बोले, “ अगर तेरी अपनी पसंद कहीं है तो बता, हमें कोई एतराज़ नहीं होगा | अभी शान्त हो जा कह कर वे अपने कमरे में चले गए | अहम पर चोट से आहत माँ भी चुपचाप जाकर लेट गयी | तनु रोते रोते सो गयी मनाने पर भी खाना खाने नहीं उठी और छुट्टी के पाँच दिन शेष रहते हुए भी अगले दिन पहली फ्लाइट से बम्बई चली गयी |

माता पिता तनु के व्यवहार से बेहद क्षुब्ध थे| तनु खूब पढ़े, अच्छी नौकरी करे, ऊंचे पद पर पँहुचे यह उनकी हार्दिक इच्छा थी | पर ऊंचे पद पर पहुँच कर तनु इतनी उदंड हो जायेगी, इतनी मनमानी करने लगेगी और इतना अहंकार हो जाएगा उसे, यह हमने कभी नहीं सोचा था | बेहद दुखी मन से पिता ने तनु की माँ से कहा | वो कुछ बोली, बस आँसू बहाती रहीं | घर का वातावरण एकदम नीरस हो गया, उदास उदास सा|
तनु गुस्से में घर से चली तो गयी पर उसे समझ में नहीं रहा था कि करे तो क्या करे? हवाई जहाज़ में बैठे-बैठे वो सोच रही थी कि छुट्टी के अभी पांच दिन शेष हैं | आसपास कहीं लोनावला, खंडाला या मडआईलेंड ही चला जाये | गोवा भी जाया जा सकता है| पर मन ने साथ दिया | कहाँ घूमेगी अकेली?, किस के साथ? तो क्या छुट्टी कैंसल करा लूं और ऑफिस चली जाऊं? पर किस किस को क्या सफाई दूंगी? सोच विचार करते हुए अपने फ्लैट में जाकर तनु अंतरंग सहेली सोनाली के घर चली गई |तुझे बहुत शिकायत रहती थी सोनू कि एक ही शहर में रहते हुए भी मैं तेरे घर नहीं आती, तुझे समय नहीं देती? तो लो मैं गयी पूरे चार दिन के लिए | अब कर जी भर के बातें, कर जी भर के मेरी खातिर |घर के अंदर प्रवेश करते ही तनु ने चहक से कहा| सोनू खुश, बच्चे और भी खुश | सोनू के पति पुष्पक ने भी तनु का हार्दिक स्वागत किया | परन्तु तनु चाहे सोनू से गप्पें लड़ाती, बच्चों के संग खेलती, पुष्पक से हँसी मज़ाक करती, मनपर जैसे भारी बोझ रखा हुआ था| उसे पछतावा होने लगा कि तरह आवेश में घर से क्यों भाग आई | मम्मी पापा को हमेशा की तरह सकुशल पहुँचने की सूचना भी नहीं दी | यह सोच कर उसका मन और भी क्षुब्ध हो गया | रात को सोने जाती तो माँ की डबडबाई आँखें याद आतीं, पापा का शांत बुझा हुआ स्वर व्यथित करता, अनु का मुरझाया घबराया हुआ चेहरा व्याकुल करता | लेकिन फिर गुस्से की एक लहर उभर जाती | मैंने पहुँचने की सूचना नहीं दी, ठीक है, पर वो भी तो मेरी खैरियत पूछ सकते थे! छुट्टियाँ लेकर क्या मुझे परेशान करने के लिए बुलाया था? शादी कर लो, शादी कर लो, अच्छी ज़बरदस्ती है! मैं नहीं पड़ती शादी-वादी के चक्कर में | देख तो चुकी हूँ शादी शुदा औरतों की हालत! दिन रात घर में कामों में जुटे रहो, सबको खुश करने में लगे रहोसबके नाज़ नखरे सहो, फिर भी कोई कद्र नहीं | रोज के लड़ाई झगडे अलग, डांट सुनो सो अलग | नौकरी तो मैं छोड़ने नहीं वाली | घर का काम एक तो मुझे आता नहीं, शादी हुई तो परिवार बढ़ेगा ही, दूसरे घर में भी खटो बाहर भी, दो दो काम करूंगी कैसे मैं? कितनी बार विदेश जाना पड़ता है, कौन जाने देगा मुझे? नहीं, शादी मेरे बस की नहीं | कोई कुछ भी कहे, कुछ भी करे| विचारों का सिलसिला जारी रहता | तनु सोचती देखा तो है शादी के बाद लड़कियों की जिंदगी, क्या से क्या हो जाती है! कुछ करना है तो पूछो, कहीं जाना है तो पूछो, कुछ खरीदना है तो पूछो | अपना वजूद तो रह ही नहीं जाता | किसी की पत्नी, किसी की माँ, किसी की बहू बन कर रहो, बस! अच्छी भली स्वतन्त्र जिंदगी को मैं बंदी क्यों बना लूं? विचार सागर में गोते लगाते, हिचकोले खाते चार दिन बीत गए और तनु अपने फ्लैट में गयी|
देर से सही, सकुशल पहुँचने की सूचना देना तनु ने उचित समझा | वह पहले की तरह, हर हफ्ते फोन करके हाल पूछ लेती मगर कोई पछतावा कोई माफ़ीनामा तनु की तरफ से हुआ, ना ही नाराज़गी प्रकट करना समझाना-बुझाना और शादी के लिए सहमत करना माता-पिता की ओर से | अगले साल छोटी बहन अनूजा की शादी में तनूजा गयी, पर मेहमान की तरह| सब पूर्ववत स्नेह से मिले, खातिर हुयी, उसके काम व् योग्यता और पदोन्नति की प्रशंसा हुयी, पर शादी की चर्चा किसी ने की | तनु अपने काम में तन मन से समर्पित रही और सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ती हुयी शीर्ष पर पँहुच गयी | लेकिन पहले जहाँ चौबीसों घंटे काम की धुन सवार रहती थी, काम काम और काम ही सुहाता था अब काम से उसका जी उचाट होने लगा | संगी साथी, सहयोगी व् कर्मचारियों से घिरी होने पर भी उसे अकेलापन लगता | हमउम्र सहेलियाँ होते हुए भी उसे सूनापन लगता | लगता कि उसके मन में कुछ है जो वह किसी से कहना चाहती है, किसी से कुछ सुनना चाहती है, पर क्या, वो समझ पाती | कभी वह सोचती जिंदगी में उसे क्या नहीं मिला- धन, दौलत, मानप्रतिष्ठा, सखा सहेली, मौज मस्ती, फिर भी अधूरापन क्यों लगता है? क्यों लगता है कि उसने कुछ खो दिया हैया कुछ पाने से वंचित रह गयी है | यह रिक्तता माता पिता के न् रहने के कारण तो नहीं? पर उन्हें तो दुनिया से गए कई साल बीत गए और इस तथ्य को वह स्वीकार कर चुकी है | कभी-कभी बीच रात में उसकी नींद खुल जाती, याद आता कि उसकी हमजोलियाँ कहती थीं कि जिंदगी की नाव अकेले खे लेना सहज नहीं, तो उनका संकेत इसी ओर था क्या? माँ ने भी समझाया था कि जब हम लोग नहीं रहेंगे तब अपना कहने के लिए कोई तो हो, उतरती उम्र में कोई तो सहारा चाहिए | तो क्या सचमें मुझे कोई सहारा चाहिए? क्या सच में मैं किसी का आश्रय  चाहती हूं? हाँ, शायद मेरे अंतर्मन में यही इच्छा बलवती हो रही है | तब क्या मैंने विवाह ना करके भूल की है? लगता है की हैभूल | तो क्या विवाह अब नहीं कर सकती? वाह तनु वाह! विवाह और इस उम्र में? तनु जोर से हँस दी | मैं अपनी आदतें, अपनी दिनचर्या बदल सकती हूं क्या? दूसरे के अनुरूप अपने को ढाल सकती हूँ क्या? जिन पारिवारिक उलझनों से बचने के लिए माँ की भावनाओं का तिरस्कार किया पापा के मन को ठेस पहुंचाई- ऐसी ठेस कि दोनों मरते मर गए मेरी शादी की चर्चा ना की | अब वही झंझट मोल क्यों लूं?

एक और खयाल आया तनु के मन में कि आज मेरी नौकरी है, अवकाश प्राप्ति के बाद क्या करूंगी? मन की ऊहापोह में तनु ने सोचा सुना है और अखबार में पढ़ा है कि अब तो बूढ़े बुढियां भी बुढ़ापे का साथी ढूंढ रहे हैं | शादी कर लेते हैं या बिना शादी के साथ-साथ रहने लगते है | बेटे विदेश में जा बसे, जीवन साथी में से एक ने अलविदा कर ली | नहीं रहा जाता अकेले, तो क्या बुरा करते हैं? पर मैं? यह सब मेरे बस का नहीं | एक तो ऐसा कोई ढुंढने की मेरी सामर्थ्य ही नहीं और जो कोई मिला भी तो क्या वो मेरी कद्र करेगा, क्या मेरे काम की सराहना करेगा, क्या मेरी स्वतन्त्र जिंदगी में बाधक ना बन मुझे पूरी आजादी देगा? फिर वो भी तो मुझसे यही अपेक्षाएं रखेगा | ना बाबा ना! अभी तो एक ही दुःख है, फिर दस परेशानियाँ, दस झंझट जुड़ जायेंगे | तो फिर? तो फिर क्या? जैसी हूँ वैसी ही ठीक हूँ, लेकिन मन उदास उदास रहता है, उसका क्या करूं? तनु ने विचारों पर लगाम कसी| अकेले रहना मेरी विवशता तो थी नहीं, मेरी अपनी मर्ज़ी थी| इसके लिए पछताऊँ क्यों? किस्मत की बात मानूं तो मेरी किस्मत में ये ही लिखा था, बल्कि अपनी किस्मत मैंने खुद बनायी है तो फिर मन मार के परास्त भाव से जिंदगी क्यों गुजारूं? दूसरों की दया का पात्र बनके बेचारी क्यों कहलाऊं? क्यों ना जीवन का भरपूर आनंद लूं, हर पल सार्थकता के साथ गुजारूं! हर क्षण सही अर्थों से जियूं| क्यों सोचूं कि मैं अकेली हूं? नहीं मैं अकेली नहीं हूं! मेरे जैसी और भी जाने कितनी हैं | वे भी तो जी रही हैं, और खुश हैं | वैसे इसमें कोई शक नहीं कि अकेले होने के अपने अलग सुख हैं, जो चाहो करो, जैसे मरज़ी रहो| किसी का रौब नहीं, किसी का दबाव नहीं | अपने प्रति अनुरक्ति, आत्म-तुष्टि का सुख ही अलग है, जो मैं खूब भोग चुकी | अपने लिए जीकर देख लिया, किन्तु औरों के लिए समर्पित भाव से जीकर सम्पूर्णता का एहसास और इसका अलौकिक आनंद भी मायने रखता है| तो औरों के लिए जीकर उसका अनुभव मैं अब नहीं कर सकती क्या? क्यों नहीं! क्यों नहीं? कितनी ही संस्थाएं हैं, बाल-विकास संस्थाएं, अपंग-अनाथ बच्चों की संस्थाएं, परित्यक्ता असहायों के लिए संस्थाएं, नारी-निकेतन अथवा वयोवृद्ध निवास | मनपसंद किसी भी संस्था से जुड़ जाओ, उनके परिवार का अंग बन समर्पित मन से, नि:स्वार्थ भाव से काम में लग जाओ, फिर देखो कैसा आनंद आता है | अकेली रहूँगी, अकेलापन महसूस होगा | अनु को राह सूझ गयी, दृष्टि  मिल गयी, और मंज़िल भी | दृढ-संकल्प से उसका चेहरा दमकने लगा, और जिन तृप्ति का एहसास उसे आज हुआ, वैसा पहले कभी नहीं हुआ था|               

                                                                                

2 comments:

  1. Prabha Ji sadar pranam,

    Ye kahani aaj ke har ek yuva ke liye thi jo jeevan ke sahi mayne bhool kar, paisa, naukari aur ijjat ko hi sab kuchh samajh baithe hain.

    Bahut prerak, bahut kuch sikhati post.

    अपने प्रति अनुरक्ति, व आत्म-तुष्टि का सुख ही अलग है, जो मैं खूब भोग चुकी| अपने लिए जीकर देख लिया, किन्तु औरों के लिए समर्पित भाव से जीकर सम्पूर्णता का एहसास और इसका अलौकिक आनंद भी मायने रखता है|

    Asha hai jaldi hi aap age bhi likhengi.

    My Website: Life is Just a Life
    My Blog: My Clicks
    .

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    1. नीरजा जी,
      "मैं अकेली नहीं हूं" के विषेय में आप की प्रतिक्रिया पढ़ कर बहुत प्रसन्नता हुई. अनेकानेक धन्यवाद. इस दिशा में मेरे प्रयत्न जारी हैं.
      प्रभा

      Neeraj Ji,
      "Main akeli nahin hoon" ke visheya main aap ki pratikriya parh kar bahut prasannata huyi. Anekanek Dhanyavaa. is didha mein mere prayatna jari hain.
      Prabha.

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