Saturday, 24 May 2014

सही दिशा में सही कदम



अभी कल तक घर में कितना धूम धड़ाका था| लोगों का आना जाना, फोन पर फोन, मोबाइल से अलग, लैंड लाइन से अलग, कोरियर व साधारण साक से आई चिट्ठियाँ, इत्यादि| खाना पीना, हँसना बोलना, बच्चों का हो हल्ला, सब| फिर भी माहौल ग़मगीन, दुःख की स्थायी सी छाया| घर में जैसे मेला लगा हुआ, फिर भी एक तरह का सन्नाटा, विचित्र सा सूनापन| दिल सबके भारी, पर दीपा| उसके दिल की हालत कौन समझ सकता था? उसकी पीड़ा, उसकी वेदना, उसकी तड़प वाही जानती थी| अभी हफ़्ते भर पहले एक जिंदगी में न्बहार ही बहार थी, अचानक वीरानी आ गई| एक झटके के साथ खूबसूरत सा आशियाना तिनके तिनके बिखर गया| हुआ क्या आखिर? यही न कि कल तक वो थे, आज नहीं हैं| 

उसे शोकसभा कहें, या प्रार्थना सभा, या चौथा, जो भी हो, दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि के साथ साथ कुछ उनके श्रेष्ठ स्वभाव व सद्कर्मों कि चर्चा हुई, कुछ संसार की क्षणभन्गुरता पर प्रवचन हुए, कुछ भजन व चेतावनी गीत गाये गये और अंत में परिवार जनों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए सभा विसर्जित हो गई| धीरे धीरे नाते रिश्तेदार, जो यह अप्रिय समाचार सुनकर भागे भागे आये थे, उसी तरह जल्दी जल्दी लौट गए| रह गई अकेली दीपा, अपने दो अबोध बच्चों के साथ, मासूम सी चार वर्ष की श्रृतु और भोला भला सात वर्ष का अनूप|

कहने को अकेली थी दीपा पर योगेश की यादें उसे अकेले कहाँ रहने देती थीं? एक अकेलेपन का दुःख हो तो झेल ले, वियूग की पीड़ा हो तो सेहन कार ले, वो तो ऐसे मझधार में फँस गई थी कि किनारा दूर दूर तक नजर नहीं आ रहा था| योगेश के साथ जुड़ी मधुर स्मृतियाँ तो उसे व्यथित करतीं ही, सामने जो समस्यायें थीं उनके कारण व्याकुलता से उसकी नींद हराम हो गई थी, भाख गायब हो गई थी| कहाँ चले गाये योगी? क्यों चले गए? वापस आ जाओ, एक बार बस एक बार| दीपा चाख चीख कार रो पड़ती|

पड़ोसी सहेली सविता बच्चों के लिए खाना ले कार आई थी| सविता सहृदय है| दीपा कि हम उम्र, अंतरंग सहेली है| दीपा को तपते देखा तो खुद भी तड़प उठी| “न रो दीपा” उसे अंक में लेते हुए सविता ने कहा|

“रोने से तेरा योगी वापस आ जाएगा क्या?अब बच्चों का मुँह देख और हौसला रख|”
“मुझे कुछ नहीं मालूम सविता, योगेश का रुपयों-पैसों का क्या हिसाब किताब है, मकान के कागज़ात कहाँ रखे हैं? डायरी देखि पर मुझे समझ में नहीं आता” दीपा ने रोते हुए कहा|

“तू बिलकुल न घबरा| मैं हूँ न! ये हैं न! तेरी मुसीबत हमारी मुसीबत है, तेरी समस्या हमारी समस्या है| हम सब मिलकर समस्याओं से निबटेंगे| थोड़े दिनों में सब ठीक हो जाएगा| हाँ!”

दीपा थोड़ा आश्वस्त हुई| धीरे से बोल, “योगेश को मैं कितना समझती थी कि अच्छा भला आदमी बाहर जाता है, शाम को सही सलामत घर लौट आएगा इसका क्या भरोसा? पिछले साल जब तुम लोगों ने पौलिसी ली थी, मैंने भी बहुत कहा बीमा करा लो, पर ये टालते रहे| बड़ी दीदी व जीजाजी ने मेडीक्लेम कराया था तब भी बहुत जोर डाला, पर नहीं तो नहीं|”

दीपा के आँसू फिर बह चले थे| पल्लू से पोछे और फिर धीरे से बोली, “मैंने कई बार कहा राम न करे, अगर तुम्हें कुछ हो गया तो बच्चों का क्या होगा, मेरा क्या क्या होगा? पर वो हर बार हँसकर कह देते, “अरे मुझे कुछ नहीं होगा इतना हट्टा-कट्टा तो हूँ| तुम नाहक चिंता करती हो|” अब तू ही बता सविता, बीमारी क्या उम्र देख कार आती है, टेलीफोन करके पूर्व सूचना देती है क्या? कि कोरियर भेजती है कि मेल भेजती है? मैंने उन्हें बहुत कहा कि ऐसा कब चाहती हूँ कि तुम्हें कुछ हो| 

पर जिंदगी का कोई ठीक है क्या? अच्छा भला आदमी अपनी गाड़ी से चला जा रहा है और सड़क दुर्घटना में खत्म| लेकिन उनका जवाब होता, “मैं बहुत संभल कार अपनी मोटर-साईकिल चलता हूँ|” 

अरे भाई तुम संभल कार चलाते हो पर दूसरा भी तो संभल कार चलाये| तू भी तो देखती है न सविता, रोज़ रोज़ कितनी दुर्घटनाएं होती हैं, बसों से, मोटरों से, रेलगाड़ियों से, और कितने लोग घटनास्थल पर ही दम तोड़ देते हैं| पर योगेश को न मेरी बात सुननी थी, न सुनी| जो बीमा करा लिया होता तो आज...”
“अब जो होना था वो हो गया| आगे की सोच| अभी तो खाना खा| बच्चे भी भूखे होंगे|”

“सविता की बात अनसुनी कर दीपा ने फिर कहा, “होनी को तो खैर, कोई नहीं टाल सकता| अब देखो न, रोज़ दफ़्तर से सीधे घर आते थे| उस दिन जाने क्या सूझी कि बाज़ार चले गए| ब्लास्ट भी तभी होना था और..” दीपा हीर फफक फफक कार रो पड़ी| “ न बीमा कराया, न वसीहत लिखी| अब हम क्या करेंगे, कहाँ जायेंगे? आँसू पोछते हुए दीपा ने कहा|

सविता दीपा को शांत कार घर आ गई पर खुद बहुत अशांत हो गई| दीपा की हालत ने उसे अपने विषय में सोचने पर मजबूर कार दिया| बीमा तो कम से कम हमें भी करा लेना चाहिए| जो आज दीपा के साथ हुआ, कल किसी के भी साथ हो सकता है| चार-छः दिन बड़ी व्याकुल रही सविता| फिर एक दिन अपने पति आशुतोष से कहा- ”देखो तुम्हारा इतना बड़ा बिज़नेस है वो भी पार्टनरशिप में| कभी कभी पार्टनर ऐसा डिच करते हैं कि पूछो मत|”

“ श्रीकांत के विषय में ऐसा खयाल भी मन में मत लाना| वो मेरा बचपन का दोस्त है|”

“श्रीकांत कि बात नहीं कार रही| लेकिन कभी कभी सगे भाई भी धोखा दे देते हैं, दोस्त कि कौन कहे|”

आशुतोष ने कुछ सुना कुछ नहीं पर सविता धाराप्रवाह बोलती गई, “वो मेरी सहेली रमा है न! उसके पिताजी कि भी पार्टनरशिप में एक्सपोर्ट का धंधा था| काम के सिलसिले में लुधीयाना गए थे| वहीं हार्ट-अटैक हुआ और बस! बवी बच्चे वहाँ भागे और यहाँ मित्रमहोदय ने रातों-रात सारा माल खिसका लिया| जब लौटे तो दुकान खाली| हिसाब-किताब भी उल्टा-सीधा समझा दिया कि धंधा तो घाटे में चल रहा था| रो पीटकर रह गए बेचेरे|”

आशुतोष कि नज़रें अखबार में गड़ी थीं| अखबार सविता के हाथ में भी था पर वो बोले जा रही थी| “अब सुप्रिया कि सुनो| उसके बड़े भैया, जी तोड़ मेहनत करके पैसा बैंक में जमा करते थे| बाहर का काट भिया देखते, रुपया पैसा उनके दोस्त सँभालते| मौका देखकर जौइंट अकाउंट का फायदा उठा उन जिगरी दोस्त ने सारा पैसा हड़प लिया| ऐसा सदमा लगा सुप्रिया के भैया को कि एक रात सोये तो सुबह उठे नहीं|

“तुम कहना क्या चाहती हो?” आशुतोष थोड़ा तैश मं आकार बोला|

“देखो, नाराज़ न हो, आशु! थोड़ा ठन्डे दिमाग से सोचो, मकान तुम्हारे नाम है, बिज़नेस तुम्हारा है, अगर...”

“अगर मुझे कुछ हो भी गया तो सारा कुछ तुम्हारा ही होगा”

सविता कि बातों से बेचैन और अधीर होते हुए आशुतोष ने कहा|

“सो तो मैं भी कमाती हूँ, आशु| अच्छा खासा बैंक बैलेंस मेरा भी है| पापा का दिया पैसा भी है और ज़ेवर भी मेरे पास बहुत हैं| मैं तो... मेरा मतलब वो नहीं है जो तुम समझ रहे हो| मैं ये कहना चाहती हूँ कि हम दोनों स्कूटर पर जाते हैं, जो दोनों ही एक साथ चल बसे तो...”

“तो? तो क्या?” आशुतोष झल्ला उठा|

हमें अपना जीवन बीमा करा लेना चाहिए, आशु| नहीं तो...”

“तो जो होगा देखा जायेगा|” लापरवाही से कहा आशु ने|

“क्या देखा जायेगा?” सविता उत्तेजित हो उठी| “कोई रिश्तेदार, कोई ऐरा-गैरा आकार हक जमा लेगा और क्या?”

“कौन है ऐसा?”

“कोई भी हो सकता है| पापा के दोस्त रामकुमार का नाम सुना होगा| करोड़ों की मिल्कियत थी| जितने ज़मीन जायजाद के धनि, उतने ही दिल के भी ढकनी थे| किसी की बेटी का ब्याह है, किसी का घर ढह गया, किसी की नौकरी छोट गई, कोई बीमार है, किसी को कहीं ज़रूरी काम से जाना है, हर एक को हर तरह से मदद करने वाले| वो तो देना ही देना जानते थे| पर जब अचानक चल बसे तो बीसियों लोग आकार खड़े हो गए| रामकुमार जे ने हमसे इतने र्रुपए उधार ल्लिये थे, हमारे उनके ऊपर इतने रूपए बकाया हैं, हमारे इतने रूपए उनके पास जमा थे| बेटा सबकी सुनता रहा, सबका उधार पत्ता रहा| कौन झगड़ा मोल ले, दुश्मनी करे|”        

सविता थोड़ा रुकी, आशुतोष के चेहरे के हाव-भाव पड़ने की कोशिश की, और फिर उसी लहज़े में कहने कगी, “एक दूसरे दोस्त भी थे पापा के, नागेन्द्रनाथ| उनकी एक उपपत्नी भी थी और उससे एक बेटा| उनके रहने के लिए सुंदर सा दो मंजिला मकान बंगाली मार्केट में बनवा दिया था| नागेन्द्र अंकल ब्याहता पत्नी और बेटा-बेटी के संग कभी सुंदरनगर में रहते कभी बंगाली मार्केट में| अंकल के न रहने पर बड़े बेटे ने बंगाली मार्केट वाले घर पर अपना हक जमाया| विमाती ही सही, थी तो माँ| सौतेला ही सही, था तो भाई| दोनों खाब रोये, गिडगिडाये पर बेटा राम का दिल न पसीजा| शादीशुदा बीवी तो थी नहीं जो जो कोर्ट कचहरी करती| न घर अपना रहा, न रुपया पैसा ही साथ लगा| अंकल ने घर अपने नाम न बनवाकर आंटी के नाम बनवाया होता तो झगड़े की कोई बात ही नहीं थी|”

आशुतोष सुनता रहा, बोला कुछ नहीं| सविता भी कब तक बोलती सो चुपचाप जाकर रसोई में काम करने लगी| लेकिन खाना खाते समय उसने फिर बात छेड़ डी|

“हमारी बुआ की बेटी है ना चित्र| ठाट से रहती थी| पता नहीं क्यों, जीजाजी का किसी ने क़त्ल कार दिया| चित्र दीदी के पास उनके क्रिया-कर्म तक का इंतजाम नहीं| कभी दीदी से बाताया नहीं कि किसी बैंक में खता है, कितना पैसा है| दीदी ने कभी जानना भी चाहा तो जीजाजी ने कहा तुम अपना घर देखो, बाहर का काम मेरा| गाँव में ज़मीन थी, पुश्तैनी मकान था| पिछले साल वो बेचा था, ये तो दीदी जानती थीं, पर रुपया कहाँ रखा, क्या किया, किसको दिया यह सब उन्हें कुछ नहीं मालूम| छोटे-छोटे बच्चे, सीधी-सधी लड़की, ऐसी कठिनाई में पड़ी कि क्या बतायें| आदमी को कुछ तो बीवी बच्चों के लिए सोचना चाहिए|” 

आशुतोष ने कुछ कहा, न कुछ टिप्पड़ी दी| बस सुनता रहा| खाना खाकर थोड़ी देर बच्चों से बातें कीं, थोड़ा टी.वी. देखा और सोने चला गया| सविता भी काम से निबट कर चुपचाप बिस्तर पर लेट गई| बोली कुछ नहीं, बस करवट बदलती रही|

आशुतोष थोड़ी देर गुमसुम रहा| फिर सविता के सिर पर हाथ फेरते हुए बोला, “आज-कल तुम बहुत नेगेटिव थिंकिंग करती हो| इतना टेंशन मत लो, तबियत खराब हो जायगी|” आवेश में कोई हो तो प्यार व हमदर्दी के शब्दों से या तो गुस्से का विस्फोट हो जाता है या आवेश पिघल कार आँसुओं का सैलाना बन उमड़ पड़ता है| सविता आशुतोष की छाती से चिपट गई औ फूट-फूट कार रोने लगी| 

आवेग थोड़ा कम हुआ तो उठकर बैठ गई और सुबकते हुए बोली, “मैं तो अपने चारों तरफ़ देख सुनकर ही परेशान हूँ, वो भी अपने लिए नहीं, बच्चों के लिए| दीपा की हालत मुझसे देखी नहीं जाती| तुम देख कार भी कुछ नहीं देखते, दूसरों के अनुभव से सबक नहीं लेते| मैं तो सिर्फ इतना चाहती हूँ कि हमारे पीछे बच्चों को कोई परेशानी न हो| आंटी के जैसी, दीपा और चित्र के जैसी डांवाडोल स्थिति न हो|

“तो क्या किया जाय?” आशुतोष भी उठकर बैठ गया|

“मेरा कहा तुम मानोगे जो मैं कुछ समझाऊँ|”

“ऐसी बात नहीं, सविता| हमेशा तुम्हार कहा मन है| तुम्हारे बिना मेरा काम चलता है क्या? तुम्हें नाराज्के मैं कहाँ रहूँगा?” बड़ी आद्र वाणी में, बड़े लड़ से कहा आशुतोष ने| “बताओ, क्या करना चाहिए हमे?”

“जीवन बीमा तो करना ही चाहिए, हम दोनों को भी अपनी वहीहत लिखनी चाहिए|” बड़ी गंभीरता के साथ सविता बोली|

“वसीहत? हमें?” ज़ोर से हंस पद आशुतोष| “अभी तो बीमा कि बात कार रहीं थी अब... वसीहत लिखने कि उम्र है हमारी-तुम्हारी?” वो ज़ोर ज़ोर से हंसने लगा|

“क्यों, क्या विधान में लिखा है, क्या कोई कानून है कि वसीहत इस उम्र में नहीं लिखी जा सकता, या पंडित ने कहा है कि इस उम्र में वसीहत कि बात नहीं करनी चाहिए?” सविता फिर आवेश में आ गई|

“अरे, मैं तो यों ही कह रहा था| अच्छा बताओ, क्या लिखेंगे हम लोग?”

“ लिखेंगे मेरा सिर और तुम्हारा सिर---“ सविता के आँसू फिर झलक आए|

“ लो तुम तो नाराज़ हो गई| ज़रा प्यार से ओलो, थोड़ा अच्छे से समझाओ| मुझे ये सब कुछ नहीं आता| मैंने कभी इस तरह सोचा भी नहीं| सच कह रहा हूँ, सविता|”

“खुद समझ नहीं आता तो दूसरे कि समझ से काम लो| लेकिन अहं के आगे आदमी किसी को कुछ समझता ही नहीं|          

“सही कह रही हो| अच्छा अब बताओ”- आशुतोष समझौते के मूड में था| सविता थोड़ी देर चुप रही| फिर आँसू पोछे, गला साफ़ किया और बोली, “बड़े चच्जी को गुज़रे कितने साल हुए?”

“यही कोई चार साल|”  

“चाचाजी तो अच्छी हैसियत वाले थे||

“हाँ! बहुत बड़ा अपना निजी मकान, अच्छा खासा बैंक बैलेंस और चची के बहुत सारे ज़ेवर|”
“तो उस सबका क्या किया चाचाजी ने?”

“ज़ेवर तो चाची जी ने अपने जीवन काल में ही बहू-बेटियों को बाँट दिए थे| मकान के लिए बचाचा ने वसीहत कि थी कि जब तक वो हैं, घर उनका रहेगा| बाद में नीचे का हिस्सा छोटे बेटे का, ऊपर का बड़े बेटे का| छत दोनों की| बैंक में जो फिक्स डिपाज़िट थे वो आधा आधा दोनों बेटियों का| पेंशन आदि का जो पैसा सेविंग्ज़ अकाउंट में था वो बराबर बराबर नाती पोते का|

‘चाचा जी के बाद बच्चों में कोई झगड़ा फसाद हुआ?’

‘बिल्कुल नहीं| सब आराम से रह रहे हैं, मिलजुलकर, प्यार के साथ| पास के पास, दूर के दूर|’
‘किसी बाहर वाले ने भी कोई छीन झापड़ नहीं की?’

‘नहीं| जब चाचाजी ने वसीयत लिख दी तो कोई क्या कहेगा?’

‘मेरे पापा ने भी वसीयत कर दी थी और जिसको जो मिलना था, मिल गया| पर जिन्होंने वसीयत नहीं की उनका हाल भी सुन लो| पापा के एक दोस्तों और अपनी बहिन चित्रा के विषय में पहले ही बता चुकी हूँ| एक और मिसाल है मम्मी की मौसेरी बहिन की| मौसाजी बहुत पहले गुज़र गए थे| 

संतान कोई भी नहीं, ज़मीन जायदाद खूब| उसका निबटारा मौसा जी खुद कर गए थे| मौसी खूब दबंग, खूब सक्रिय| अकेली बड़े भारी बंगले में रहतीं| पहले कोई परेशानी नहीं हुयी, जब निढाल होने लगीं तो उनके मन में तरह तरह के ख्याल आने लगे| सोचा, ज़िन्दगी और मौत के बीच साँसों का जो पुल है, पता नहीं कब ध्वस्त हो जाय| बंगले का और रुपयों पैसों का कोई तो इंतजाम करना चाहिए| मौसी सोचती रहती क्या इस घर को ओल्ड ऐज होम बनवा दूं, क्या किसी अनाथालय को दान कर दूं, कोई ट्रस्ट बना दूं? पर कहीं भी चित्त स्थिर न हो पाया| कानूनी दृष्टि से मौसी के घर व धन संपत्ति के हकदार उनके इकलौते देवर थे लेकिन ‘अंतिम इच्छा’ के रूप में मौसी ने घर देवर के बेटे सुलभ के नाम लिख दिया|’

कहानी में बड़ा रोचक सा मोड़ आनेवाला थी लेकिन सविता को लगा आशुतोष रूचि नहीं ले रहा है| उसे झकझोर कर पूछा सविता ने ‘सुन रहे हो न?’              

‘हाँ हाँ फिर क्या हुआ?’

‘हुआ ये कि मौसीजी का दूर का भतीजा करण उन्हीं दिनों अपने निजी काम से इलाहाबाद आया था| दो चार दिन मौसी के साथ रहकर उसने उनकी मजबूरी ताड़ ली| उनसे खूब चिकनी चुपड़ी बातें की, खूब हमदर्दी जताई, खूब हाथ पाँव दबाये और मौसी का मन मोह लिया| एक दिन आँखों में आंसू भर कर कहा ‘आपकी हालत देखि नहीं जाती, बुआ| यह उम्र और घर का इतना काम! इस समय तो आपकी देखभाल व सेवा होनी चाहिए’

‘अरे, कौन बैठा है रे, मेरी सेवा करने के लिए’

‘ऐसा क्यों सोचती हैं आप? मैं हूँ न! मुझे क्या, जो काम नैना में रहकर करता हूँ वो यहाँ से भी कर सकता हूँ| वक्त ज़रुरत के लिए कोई तो पास में हो|’ मौसी गदगद, और भतीजे राम ने घर में डेरा जमा लिया| इसी तरह एक दिन मौसी को मतिभ्रम करके परिवार को भी बुला लिया| ‘इतना बड़ा घर, सूना सूना लगता है, बच्चों से रौनक हो जायेगी| पुष्पा आपकी खूब सेवा करेगी|’ अंधा क्या मांगे, दो आँखें| बुढ़ापे का सहारा तो चाहिए ही था, सो आ गई’ बातों में और करण के बीवी बच्चों मौसी के घर में आ बसे| वाकई पुष्पा मौसी को पाँव ज़मीन पर न रखने देती| उनके मन का खाना बनाती, प्यार से खिलाती, समय से दबा देती, सर में तेल मालिश करती और रात में रोज़ पाँव दबाती| मौसी तो बाग बाग| एक दिन पुष्पा ने कहा ‘सास ससुर के दर्शन मुझे हुए नहीं| धन्यभाग मेरे, कि आपकी सेवा करने का अवसर मिला|’ मौसी ने प्यार के साथ अपना वरदहस्त पुष्पा के सर पर रख दिया| अब तो पुष्पा मौसी के पैरों से लिपट गई|

‘ये चरण ज़िन्दगी भर न छोडूंगी बुआ, आखिरी दम तक नहीं|’

मौसी का दिल पसीज उठा| सोचने लगीं कहाँ का देवर, कहाँ की देवरानी| बुलाये बुलाये आते नहीं, झाँकते नहीं, पूछते तक नहीं| और सुलभ का क्या ठीक| बाहर पढ़ने गया है, कहो लौटे, कहो वहीँ बस जाय| जो आखिरी वक्त में साथ दे, जो सेवा टहल करे वही अपना| और भतीजे व बहू के आश्वासन से मौसी ने अपनी अंतिम इच्छा, अपनी वसीयत बदल दी| जाने कैसे देवर्जी को मनक पड़ गई| भागे भागे आए मियाँ बीवी| भतीजे राम को खूब खरी खोटी सुनाई और जैसे तैसे उसे घर से खदेड़ा|’ कहानी खत्म हुई तो सविता लेट गई| आशुतोष भी लेट गया और बोला ‘किसी की वसीयत बदलवाना बड़ी हिम्मत का और जोखिम का काम है|’ ‘आगे की भी तो सुनो’ सविता को जैसे कुछ याद आ गया| 

पिछले साल जब मौसीजी का देहान्त हुआ तो उनकी नौकरानी मौसी के दस्तखत किये पपेरों के साथ सामने आ गई| ‘घर तो मालकिन ने मेरे नाम लिख दिया था, ये देखो|’ मालूम नहीं पेपर जाली थे या मौसी से गलती हो गई थी पर देवर जी ने बड़ी मुश्किल से ले देकर मामला रफा दफा किया|

आशुतोष थोडा अलसा रहा था| उवासियाँ लेने लगा| उस पर कोई प्रतिक्रिया न दिखी तो सविता फिर बौखला गई| ‘इतनी बड़ी बात बता रही हूँ और तुम पर कोई असर नहीं| घर की बात है न, तो छोटी और मामूली लगती है| बाहर देखो बड़े बड़े लोगों के साथ क्या क्या हो रहा है|’ आशुतोष ने जिज्ञासा के साथ सविता की ओर देखा, बोला कुछ नहीं| 

बोली सविता- ‘अख़बार तुम पढ़ते हो खबरें मुझे ज़्यादा पता रहती हैं| दुनिया जानती है कि धीरुभाई अम्बानी की 75,600 करोड़ की संपत्ति थी| उन्होंने कोई लिखित वसीयत नहीं छोड़ी| अब देखो दोनों बेटों मुकेश और अनिल में प्रापर्टी के पीछे कैसे छीना झपटी हो रही है| मानहानि का दावा करने तक से नहीं चूकते| प्रियम्बदा बिड़ला किसी वजह से बेटों से नाराज़ हो गयी और साड़ी सम्पत्ति अपने निजी सचिव लोढा के नाम पर कर दी| बिड़ला बन्धु वसीयत को जाली बताकर 2004 से कोर्ट के दरवाज़े खटखटा रहे हैं| 

और जानते हो, प्रवीन बाबी इतनी बड़ी सिने कलाकार थीं पर अकलदो कौड़ी की नहीं| परिवार से कट कर रहीं, अकेली रहीं, कष्ट में रहीं| दौलत छोड़ी चार करोड़ की, पर किसके नाम? किसी के नहीं| अब जाने कहाँ कहाँ से उनके तथा कथित रिश्तेदार अपने अपने दावे ठोक रहे हैं| मफतलाल और सिंधिया परिवारों में भी ऐसा ही कुछ हुआ था| 

ये तो खैर ऐश्वर्यशाली परिवार ठहरे| सौ बात की एक बात ये कि आदमी छोटी हैसियत का हो या बड़ी, उसे जीवन बीमा करा लेना चाहिए और अपनी वसीयत तो ज़रूर लिख देनी चाहिए ताकि बाद में न ऐसी परिस्थिति आए कि बच्चे सड़क पर, न ये कि लड़ें झगड़ें, और कोर्ट कचेहरी करते फिरें, बल्कि प्यार से मिल जुलकर रहें और प्रेम व श्रद्धा के साथ माता पिता को याद करें|

आशुतोष ने सविता का सिर सहलाया और मुग्ध भाव से कहा ‘तुम्हे तो वकील होना चाहिए था सविता|’

‘अब चिढायो मत मुझे’ सविता ने रूठते हुए स्वर में कहा|

‘मैं सच कह रहा हूँ| ऐसे तर्क पेश करती हो कि आदमी सही को गलत और गलत को सही मान ही ले|’

‘क्या मतलब? जो कुछ मैंने कहा सब गलत है?’

‘न बाबा न! मतलब यह कि तुम्हारी बात एक सौ एक प्रतिशत सच| मैं कल ही इस बारे में पूछताछ करता हूँ|’

‘अभी ऐसा कह रहे हो, सुबह तक सब भूल जाओगे|’

‘अब तो भूलने का कोई कारण नहीं|’

‘प्रामिस?’

“हाँ प्रामिस|’

सविता मुस्कुरा दी| प्यार से आशुतोष को गले लगाया, माथा चूमा और करवट बदल कर कहा ‘अच्छा अब सो जाओ’ और स्वयं सोने का अपकर्म करने लगी| उसे संतोष था कि आशुतोष को वह सही समय पर, सही दिशा में, सही कदम उठाने के लिए प्रेरित कर सकी|           
                                    

Saturday, 16 June 2012

दीप से दीप जले

(बाल मनोविज्ञान से संबंधित कहानी) 


सर्दियों की एक सुहावनी सी सुबह| चढ़ते सूरज की गुनगुनी धूप वरांडे में फैलने लगी थी| विनीत की नज़रें समाचार पत्र की सुर्ख़ियों पर दौड़ रहीं थी और सुकेशी जल्दी-जल्दी परिशिष्ट से सिने-तारिकओं की रंगीन तस्वीरें देख रही थी| साथ ही दोनों चाय का दैनिक कार्यक्रम निबटाने में लगे थे| तभी डोरबेल घनघनाई| विनीत ने दरवाजा खोला, किशन था| किशन यानि विनीत का रिक्शे-वाला, जो उसे रोज घर से दफ्तर और दफ्तर से घर लाता लेजाता था| आज छुट्टी के दिन कैसे? विनीत पूछने ही वाला था कि उसके ठीक पीछे एक छोटी सी लड़की और उसका हाथ पकड़े खड़ी उसकी माँ को देख विनीत ने कहा, “ आओ, अंदर आ जाओ! कुर्सी पर बैठते हुए किशन बोला, “ आपको घर के काम के लिए मददगार चाहिए ना! तो मैं ---------“ महिला की ओर देखते हुए विनीत ने सोचा ठीक है, तीस-पैंतीस की उम्र, दुबला पतला बदन, साफ़-सुथरी, भली-सी| किन्तु इतनी बड़ी महिला, शादी-शुदा महिला, बाल-बच्चों वाली महिला, चौबीस घंटे हमारे पास कैसे रहेगी, और हमें चाहिए हर वक्त का मददगार| मगर विनीत और सुकेशी के आश्चर्य की सीमा ना रही जब किशन ने कहा कि काम के लिए वह छोटी लड़की को लाया है| पति-पत्नी, दोनों की आँखें बच्ची के चेहरे पर टिक गईं| भोली-भाली मासूम सी, कृशकाय, होगी कोई ९-१० साल की| यह क्या काम करेगी? विनीत और सुकेशी ने एक-दूसरे की ओर देखते हुए आँखों ही आँखों में प्रश्न किया| किशन ने उनकी शंका को भांप लिया| “ लड़की चुस्त है साहब! जो कहेंगे वो कर लेगी| घर में सब काम यही करती है” विनीत को अश्वस्त करने की दृष्टि से किशन ने कहा|


“इसे तो स्कूल जाना चाहिए, पढ़ना-लिखना चाहिए, खेलना-कूदना चाहिए!” दया व ममता के मिश्रित भाव से सुकेशी बोली| “स्कूल जाती थी, लेकिन पढ़ाई छुड़ानी पड़ी| घर में इसके दो छोटे भाई हैं| मैं फैक्ट्री में दिहाड़ी पर काम करती हूं| पर अकेले की कमाई से गुज़ारा नहीं होता| इसी कारण इसकी बड़ी बहिन को गाँव नानी के पास भेज दिया है|” डबडबायी आँखों वा तरल स्वर में महिला ने कहा|
“इसके पापा क्या करते हैं?” स्वाभाविक सा प्रश्न था विनीत का| “वो काम करता बाबूजी, तो इसे नौकरी का शौक थोड़े ही है| कमाता-धमाता कुछ नहीं, दारू के पैसे इससे रोज़ झटक लेता है| ना दे, तो मारता है| मार-मार कर देखो, क्या हालत कार दी है इसकी!” महिला की ओर बड़ी सहानुभूति के साथ देखते हुए किशन बोला

विनीत को तरस आ रहा था माँ पर, उसकी हालत पर, बच्ची पर, जिसे इस नन्ही सी उम्र में काम पर लगाया  जा रहा है| विनीत और सुकेशी पशो-पेश में पड़ गए| इतनी छोटी लड़की से काम करवाना बाल-मजदूरी नियम के विरुद्ध तो है ही, मानवीय भावनाएं इसे स्वीकार करें, कैसे? लेकिन उनके दया रहन करने से क्या वो पढ़ने चली जायेगी? यहाँ नहीं तो कहीं और काम करेगी|
“ किशन आप दोनों के बहुत गुण गाता है| आपके साथ रहेगी तो इसकी जिंदगी सुधर जायेगी|” पति-पत्नी को चुप देख माँ ने मिन्नत के स्वर में कहा|

ज़रूरत तो सुकेशी को थी ही, वैसे भारी-काम, बरतन, झाडू-पोछा, कपड़े आदि के लिए बाइयाँ थीं, किन्तु ऊपर का काम करने और भाग-दौड़ करने के लिए भी तो कोई चाहिए| जुड़वाँ बच्चे-अंशु और राशि के जन्म के साथ ही सुकेशी आरथराइटिस की मरीज़ हो गई थी| अतः सुबह शाम ही सहायता की मौहताज थी| पहले एजेंसी की दो लडकियां रख चुकी थी, पर साल भर काम करने के बाद जो घर गईं, सो वहीँ की हो गईं| इस समय, एजेंसीवालों के पास कोई लड़की नहीं थी, तो विनीत और सुकेशी ने आपस-में सलाह कर तय किया, फिलहाल इसे रख लेते हैं| बच्चे से चाहे जो काम करवा लो, डांट-डपट कर लो, कोई कठिनाई नहीं| पूरे समय घर में रहेगी तो थोड़ा सहारा तो हो ही जायेगा|

“ क्या नाम है तुम्हारा?” सुकेशी ने बच्ची से पूछा|

“लता” मीठी-महीन आवाज़ में उत्तर मिला|

“काम करना चाहती हो?”

“हाँ”

“दिन रात यहीं रहना पड़ेगा?”

“रहूंगी!” कड़े स्वर में लता बोली|

“ मम्मी को याद करके रोओगी तो नहीं?”

“नहीं”

बच्ची का आत्म-विश्वास देख विनीत और सुकेशी ने सोचा यह प्रयोग भी क्यों ना किया जाए|
“तो कबसे काम करेगी?” विनीत ने लता की माँ से पूछा|
“ आज से, अभी से! आपके पास रहेगी, खायेगी-पीयेगी, तो मैं निश्चिन्त होकर फैक्ट्री जा सकूंगी| अकेली लड़की घर में कैसे छोडूँ बाबूजी?”

महिला की ज़रूरत और मजबूरी साफ ज़ाहिर हो रही थी| सुकेशी ने उसे आश्वस्थ करते हुए कहा, “ फ़िक्र ना करो, हमारे घर में बच्चे की तरह रहेगी”

“ तो अभी मैं चलती हूँ, शाम को इसके कपडे दे जाऊँगी|”

बेटी के सिर को प्यार से थप-थपा कर लता की माँ किशन के साथ चली गई|

लाता पहले दिन तो डरी-डरी , सहमी-सहमी रही, पर थी चैतन्य और सक्रिय| दूसरे दिन से वो दौड़-दौड़ कर काम करने लगी, मानो महीनो से घर में रहती हो| डोरबेल बजती तो आगे-आगे भागती, फोन खुद उठाती, और कायदे से बात करती, कोई आया नहीं कि पानी का ग्लास लेकर दौड़ती| लगभग सभी काम जल्दी सीख गई| संवेदनशील इतनी कि सुकेशी को सुस्त देखती तो कहती, आप लेट जाओ दीदी, मैं सब कर लूंगी| सुकेशी कराहती तो कहती, “ पैरों में मालिश कर दूं दीदी? सिर दबा दूं दीद?” अपने स्नेहिल व्यवहार से, मृदु-भाषा से और सक्रियता से जल्द ही लता ने सुकेशी और विनीत का मन मोह लिया|   

लता खूब ही खुश-मिज़ाज लड़की थी| हर समय कूदती-फांदती रहती| बातूनी भी गज़ब की| महीने में दो बार घर जाती, सिर्फ दिन भर के लिए, तो सारा घर सूना-सूना, खाली-खाली लगता| विनीत के मन में लता के प्रति विशेष स्नेह था| वह सोचते हमारे अंशु और राशि कैसे लड़ते झगड़ते हैं, हठ करते हैं, रूठते हैं और बहस भी करते हैं| अपना काम खुद करना तो जानते ही नहीं| लता में इतनी समझ, इतना बड़प्पन, इतनी सहनशीलता और काम करने की क्षमता कहाँ से आई? इसे क्या माँ-बाप की याद ना आती होगी? बच्चों के साथ खेलने के लिए क्या इसका मन ना मचलता होगा पर वह चुप-चाप खड़ी देखती और मुस्कुराती रहती है|

आई तो थी लता ऊपर के काम करने के लिए अर्थात फिल्टर से बोतलें भरना, पौधों को पानी देना, खाना टेबल पर पहुंचा देना, फिर खाली बर्तन उठाना, टेबल पोछना, भागदौड़ के काम करना, वगैरह-वगैरह पर धीरे-धीरे काफी कुछ सीख गई| चाय अच्छी बना लेती, दाल-चावल पका लेती, सुकेशी बताती जाती तो सब्जी भी बुरी ना बनती| चपातियाँ बेशक कभी श्री लंका के आकार की होतीं, कभी दक्षिण अमेरिका के, किन्तु जल्दी ही तश्तरी सी गोल गोल बिलने लगीं, बताशों सी फूलने लगी| कभी-कभी विनीत और सुकेशी आपस में बात करते कि इस वर्ग की लडकियां चाहें अधिक पढ़-लिख नहीं पातीं, किन्तु कच्ची उम्र में भी उनका व्यवहारिक ज्ञान कितना बढ़ जाता है, नन्ही-नन्ही बच्चियों की तारह चतुर व होशियार हो जाती हैं|

वैसे लता को सुकेशी से डांट भी खूब पड़ती थी| कभी दूध उबल कर गिर जाता, कभी सब्जी जल जाती, कभी कप या गिलास टूट जाता, कभी पानी का नल खुला रह जाता और कभी छत पर से सूखे कपडे उठाना ही भूल जाती| एक सुबह जब विनीत की आँख खुली तो सुकेशी मे लता पर नाराज़ हो रही थी|

“ क्या हुआ भाई?” पास जाकर धीरे से विनीत ने सुकेशी से पूछा|

“ रात को राजकुमारी जी बाहर का दरवाज़ा बंद करना भूल गई| कितनी तो घटनाएं, दुर्घटनाएं होती रहती हैं, इसे कुछ पता है! कितनी बार समझाऊँ, इसके भेजे में कुछ घुसता ही नहीं|” सुकेशी आपे से बाहर हो रही थी और लता सिर झुकाए अपराधी भाव से खड़ी थी|

“ आगे से ध्यान रखना बेटा!” विनीत ने समझते हुए लता से कहा|

“ क्या ध्यान रखेगी ये? अभी परसों गैस बंद करना भूल गई थी, आज दरवाज़ा खुला छोड़ दिया| जो घर में आग लग जाए, जो घर में कोई घुस ही पड़े|”

“ बस अब गलती नहीं करेगी| हैं ना लता? अच्छा दो कप बढ़िया सी चाय तो बना के ले आओ| ” लता को भेज कर विनीत सोचने लगा सुकेशी दिल की बुरी नहीं है, लाता को प्यार भी तोह खूब करती है, सहृदय है, नेक है| बस उसकी बीमारी ने उसे चिडचिडा बना दिया है| अतः शांत करने की दृष्टि से सुकेशी को सोफे पर अपने पास बिठाया, करुण स्वर में कहा, “कभी कभी हम लता पर बहुत ज्यादती करते हैं, उससे बहुत अपेक्षाएं रखने लगे हैं| हम चाहते हैं उसके काम में कोई भी कमी ना रहे, उससे कोई भूल ना हो| हमें याद ही नहीं रहता कि वह कोई काम करने मं अम्यस्त व अनुभव प्राप्त युवती नहीं बल्कि एक छोटी सी बच्ची है और बाप के निठल्लेपन तथा माँ की मजबूरी का खामयाज़ा भुगत रही है|

“ कभी-कभी तो ऐसी हरकतें करती है कि मैं तुम्हे क्या बताऊँ? छत की मुंडेर से लटक कर नीचे झांकती है, सीढ़ियों की रेलिंग से झूलती और उस पर फिसलती है| जो गिरी तो खुद तो मरेगी ही, हमें भी फाँसी चढ़वाएगी |” थोड़े ठन्डे क्रोध के साथ सुकेशी ने कहा|     

“ सो तो ठीक है पर है तो आखिर उल्हड़ बालिका ही| अपनी राशि से भी छोटी है| राशि कम ऊधम मचाती है क्या? लता का भी बालमन जब कभी किलोलें करने लगता है, तो ऐसी हरकतें कर बैठती है| अब तुम्हीं सोच कर देखो- जो बचपन आँगन में खेलते कूदते बिताना चाहिए, वो रसोई घर में समर्पित हो गया| खुद खाने-पीने  के दिन हैं, मौज-मस्ती के दिन हैं, पर वो स्वयं परिवार-पालक बन गई है| वैसे तुम कहो तो इसे घर वापस भेज दें, कोई और इंतज़ाम कर लें?”

“नहीं, ऐसा मैंने कब कहा, लता से अच्छी लड़की हमें कहाँ मिलेगी?”

“तो फिर लता को हम सहायक ही समझें| गैस बंद करना, दरवाज़ा बंद करना व बाकी सब जिम्मेदारियाँ मेरी और तुम्हारी| ठीक है न? “

“ हाँ!” मुस्कुराते हुए सुकेशी ने समर्थन दिया|

“ मैं तुम्हे सच कहता हूँ, सुकेशी, लता बहुत ज़हीन हैं| अगर इसे पढ़ने का मौका मिले तो ज़रूर कुछ बन सकती है|”

“ है बहुत जिज्ञासु| राशि की पुरानी कॉपी लेकर, किताब में देख-देख कर चित्र बनाती है, फिर उनमें रंग भरती है| कभी-कभी अखबार में मुख्या-समाचार पढ़ने की कोशिश करती है|” लता के प्रति सहृदयता व्यक्त करते हुए सुकेशी ने कहा|

“ अगर तुम्हारी तबियत ठीक होती तो इसे स्कूल में भरती करा देते” सुकेशी का मन टटोलना चाहा विनीत ने|

“ लता स्कूल जाने लगी तो घर का काम कौन संभालेगा?”

“ टो तुम्हीं घर में थोड़ा-थोड़ा पढ़ा दिया करो न!” विनीत का सुझाव था|

“मुझे पहले ही दो बच्चों को देखना पड़ता है” विरोध स्वरूप सुकेशी बोली|

“और जो तीन बच्चे होते तो?”

“तो उसे भी मैं पूरे मन से पढ़ाती|” मुस्कुरा कर सुकेशी बोली| “ वैसे जब मैं बच्चों को पढ़ाती हूँ तो वो भी अपनी कॉपी किताब देखती है|”

“ कोई बात नहीं, सोचेंगे इस विषय में|” विनीत टाल गया|
यों तो घरेलू सहायक के रहने, सोने के लिए अलग से एक कोठरी थी पर घर के एकदम कोने में अकेले सोने से लता कहीं डर न जाये, तो बच्चों के कमरे में ही उसके सोने की व्यवस्था कर दी गई| दरवाज़े सेजरा हट कर, दीवार से सट कर, ज़मीन पर बिस्तर बिछाकर वो सोती| दिन भर की थकी लेटते ही गहरी नीद में सो जाती| पर कभी कभी देर रात तक सोये हुए दोनों बच्चों- अंशु और राशि को हसरत भरी नजरों से निहारती रहती| वह सोचती, इतने बड़े पलंग पर, ऐसे मोटे-मोटे गद्दों पर, सफ़ेद-सफ़ेद चादर पर, मुलायम-मुलायम रेशमी रजाई ओढ़कर सोने में कितना मज़ा आता होगा| और एक सुबह बच्चों का बिस्तर बनाते बनाते बस अपने को रोक न पायी लता| लेट कर देखूं तो सही, दायीं करवट, बायीं करवट, चिंत, फिर यह हुई थी कि दीदी का तीखा स्वर सुनाई दिया “बच्चों के बिस्तर पर क्यों सोयी है?”       

“ सोयी नहीं दीदी, बस लेटी थी”

“क्यों लेटी थी बच्चों के बिस्तर पर?यह कोई लेटने का समय है? और लेटना ही है तो तुम्हारा बिस्तर अलग है न?” दीदी ने ज़रा आक्रोश के साथ कहा|

लाता सुनती रही चुप्चाप, सिर झुकाए, और सोचती रही, मेरा बिस्तर अलग है, मेरे खाने के बर्तन अलग हैं, चाय का कप और गिलास भी अलग है| क्यों हैं मेरी सब चीज़ें अलग-अलग? अंशु और राशि के दोस्त आते हैं, तो इन्ही गिलासों में पानी पीते हैं, भैया और दीदी के पास कोई आता है, तो उन्ही कपों में चाय पीते हैं, और मेहमान सब उन्ही बर्तनों में खाना खाते हैं| मुझमें कोई छूट लगी है क्या? बहुत उदास हो गई थी लता|

लता अंशु और राशि की हमउम्र ही थी| वैसे अंशु लता से थोड़ा लंबा और स्वस्थ बदन का था, और राशि कद  में थोड़ी छोटी और छरहरी थी| रूप रंग में तीनो सामान थे| लता रहती भी साफ़-सुथरी और तलीके से| यहाँ तक कि परिवार के मित्र कभी कभी लता को राशि समझ लेते या राशि की सहेली| अंशु और राशि सुबह सुबह वैन में स्कूल जाते| भाग-भाग कर वैन में चढ़ते बच्चों को लता निहारती रहती| वैन में दूसरे बच्चों को देख मुस्कुरा देती| एक दिन किसी बच्चे ने पूछ ही लिया, “ तुम स्कूल नहीं जाती?” कुछ नहीं बोली लता पर मन-ही-मन कहा जाती थी, इसी तरह तैयार होती थी, लेकिन वैन में नहीं पैदल जाती थी| स्कूल से ड्रेस मिलती थी, किताबें मिलती थीं. दोपहर का खाना भी मिलता था| मैडम पढ़ाती तो थीं किन्तु मारती बहुत थीं, क्योंकि हम पढ़ते ही नहीं थे| पढ़े कैसे? घर जाओ तो मम्मी काम में लगा देतीं| घर में हमें कोई पढ़ाने वाला भी नहीं था| मेरी मम्मी हिंदी ही नहीं पढ़ीं, अंग्रेजी या गणित कैसे पढ़ातीं? अंशु और राशि को तो उनके मम्मी और पापा दोनों पढ़ाते हैं| सच पूछो तो हमें न स्कूल जाना अच्छा लगता था, न पढ़ना| जी चाहता खेलो, और खेलते ही रहो| लेकिन अब लगता है क्यों नहीं पढ़ती थी? अंशु और राशि के पास इतनी अच्छी-अच्छी किताबें हैं, टेबल कुर्सी पर बैठ कर पढ़ते हैं| स्कूल में भी टेबल-कुसी पर बैठ कर पढ़ते होंगे| हम तो ज़मीन पर बैठ कर पढ़ते थे| हमारा स्कूल टेंट में लगता था न! मैं भी अंशु और राशि के जैसे स्कूल में क्यों नहीं पढ़ सकती? पढ़ने वाले बच्चों को सब प्यार करते हैं| आते ही पूछते हैं, किस क्लास में हो? मुझसे कोई नहीं पूछता| अंशु और राशि के लिए सब चौकलेट लाते हैं, टॉफी लाते हैं, बिस्किट लाते हैं, मेरे लिए कोई कुछ नहीं लाता| जो बच्चे पढ़ते हैं, उन्हीं को तो सब प्यार करते हैं| मैं पढ़ती नहीं इसीलिए मुझे कोई प्यार नहीं करता| कोई मेरे लिए चौकलेट क्यों लाएगा?
छुट्टी के दिन अंशु और राशि देर तक सोते थे| उठते तो टीवी देखते| शाम को भी देखते, रात को भी देखते| लता सोचती जब मैं रोज सुबह ६ बजे उठती हूँ तो छुट्टी के दिन मैं भी देर तक क्यों नहीं सो सकती? टीवी के सामने ज़रा सा खड़ी हो जाती हूँ, तो दीदी चिल्लाती हैं, “तू क्या कर रही है यहाँ? चल अपना काम कर!” क्यों होता है ऐसा? लता सोचती पर कुछ निष्कर्ष न निकाल पाती| थी तो आखिर अबोध बालिका ही|

बच्चे एक दिन फल खा रहे थे| अंशु के हाथ में संतरा था, राशि ने केला उठाया| एक सेब लता ने भी ले लिया| चार में से तीन सेब देख दीदी ने पूछा, “ सेब किसने लिया?”

“मैंने लिया” लता बोल पड़ी|

“ अपने आप से क्यों लिया?तुझे हम देते तो हैं हर चीज़, पर चोरी से खाने की आदत नहीं जाती| कभी चौकलेट उठा लेती है, कभी बिस्किट, कभी फल” सुकेशी लता को डपट रही थी|

“ मैं कहाँ चोरी से उठाती हूँ, सबके स्स्मने लेती हूँ, सबके सामने खाती हूँ|”

लता की रोती सूरत देख सुकेशी थोड़ा नरम होकर बोली, “ जो चीज़ चाहिए हो, मांग लिया करो| अपने हाथ से बिना पूछे उठाना चोरी होती है| समझ गई न?”

सिर हिला कर लता ने सुकेशी को तो आश्वस्त कर दिया, मगर उसका मन विचलित हो गया| अंशु और राशि अपने अप्प, अपने हाथ से सब चीज़ें अलमारी से, फ्रिज से, निकाल-निकाल कर लेते हैं तो वो चोरी नहीं होती, मैंने एक सेब उठा लिया तो चोरी हो गयी| वो बच्चे हैं, मैं बच्ची नहीं हूँ? उन्हें भूख लगती है, दिन-भर टॉफी, बिस्किट, चॉकलेट, चिप्स खातें हैं, मुझे भूख नहीं लगती? बहुत आहत हो गई थी लता!

उसकी आँखों से झर-झर आंसू बहने लगे| भावना का तूफ़ान थमा तो उसे कई दिन पहले की घटना याद आ गई| बच्चे फ्रूट केक खा रहे थे| लता को भी एक टुकड़ा मिला| उसे फ्रूट केक अच्छा लगा| “दीदी मुझे और केक चाहिए” बड़े मन से सुकेशी से कहा| “अभी दिया था न!बचेगा तो दे देंगे” लापरवाही से बोली सुकेशी| लता चुप रह गई और ललचाई आँखों से देखती रही और सुनती रही| “ और लो न!” सुकेशी ने राशि से कहा| “बस चार स्लाइस से तुम्हारा मन भर गया, चलो कोई बात नहीं शाम को खा लेना” अंशु से कहा और सुकेशी ने बाकी बचा केक फ्रिज में रखवा दिया| लता सोचती रही दीदी ने मम्मी से कहा था चिंता ना करो, हमारे बच्चे की तरह रहेगी, लेकिन कहाँ हूँ मैं बच्चे की तरह? मुझसे कहा था जो चाहिए वो मांग लिया करो| मांगो तो घुड़क देती हैं| ठीक है, अब तक चोरी नहीं की, अब ज़रूर छिप कर खाऊँगी, चुरा-चुरा कर खाऊँगी| भावावेश में लता फिर बिलख-बिलख कर रोने लगी|

उस दिन अंशु और राशि को रिपोर्ट कार्ड मिले थे| दोनों अच्छे अंकों से पास हुए थे| पहले तो घर में खूब हो-हल्ला हुआ, खूब हँसी, खिल-खिलाहट हुई, खूब चुम्मी-पप्पी हुई| फिर शाम को भैया-दीदी सब को कार में बिठा कर घुमाने ले गए| लता को भी ले गए| मोटर में घूमने में लता को बहुत मज़ा आया| पहले सब ने फ्रूटी पिया, फिर पार्क में दौड़े, खेले, झूला-झूले, फिर रेस्टरौ में खाना खाया और सबसे अंत में आइस-क्रीम| लता को भी सब कुछ खाने को मिला, बेशक उसे अलग बिठाया गया| आइस-क्रीम भी मिली, भले ही छोटा कप दिया गया|

लता ने देखा रेस्टरौ मैं बहुत भीड़ है| सभी भर-भर प्लेट खाना खा रहे हैं| पूड़ी-सब्जी, छोले-भठूरे, इडली साम्भर- और भी ना जाने क्या क्या, जिनके नाम भी वो नहीं जानती| कहाँ से आते हैं इन लोगों के पास इतने पैसे? उसके मन में सवाल उठा| यहाँ सभी लोग मोटर पर आते हैं| घर में भी भैया-दीदी के पास कई लोग मोटरों मैं ही आते हैं| एक मोटर कितने की आती होगी? ज़रूर बहुत महँगी होती होगी! अचानक लता का ध्यान जूठे बर्तन उठाने वालों की ओर गया| लोग कैसे इतरा–इतरा कर खाते हैं, और ये बेचारे दौड़-दौड़ कर टेबल पोछते हैं, पानी देते हैं, जूठे बर्तन उठाते हैं| अच्छा अब समझ में आया| ये लोग भी मेरी तरह पढ़े, लिखे नहीं हैं तभी तो इनकी हालत और मेरी हालत एक जैसी है| मैं भी तो जूठे बर्तन उठाती हूँ, टेबल पोछती हूँ, पानी पिलाती हूँ|
खा-पी कर सब घर आ गए| रात बिस्तर में लेटी लता तो उसके दिमाग में रेस्टरौ का दृश्य उभरता रहा| जूठे बर्तन उठाने वाले लड़के याद आते रहे, हचक-हचक कर खाने वाले लोग याद आते रहे| फिर वो सोचने लगी सब लोग कितने खुश थे| आंटी और अंकल लोग कैसे आपस में घुल-मिल कार बातें कार रहे थे| सब लोग बच्चों को कैसे दुलरा-दुलरा कर खिला रहे थे| घर में भी भैया और दीदी बच्चों से कितना प्यार करते हैं| मेरे पापा क्यों हमें प्यार नहीं करते? क्यों मम्मी से अच्छी-अच्छी बातें नहीं करते? मेरे पापा-मम्मी भी क्यों इन लोगों की तरह अच्छे-अच्छे कपडे नहीं पेहनते? पापा तो बस शराब पिए पड़े रहते हैं, गालियाँ देते हैं, और लड़ाई-झगड़ा करते हैं| हाँ मैं समझ गई| पापा पढ़े लिखे नहीं है ना, तो वो जानते ही नहीं कि शराब बुरी चीज़ है, कि पढ़ने से अच्छी नौकरी मिलती है| अच्छी नौकरी होगी तो अच्छा खाने को मिलेगा, अच्छा बिस्तर सोने को मिलेगा| पढ़े-लिखे लोग हमारे जैसे झुग्गी-झोपडी में थोड़े ही रहते हैं? इसका मतलब अच्छी जिंदगी चाहिए तो पढ़ना-लिखना चाहिए! मैं पढ़ी नहीं तो क्या मैं हमेशा जूठे बर्तन उठाती रहूंगी, टेबल पोछती रहूंगी? सोचते-सोचते जाने कब उसकी नींद लग गई|

सुबह लाता की आँख रोज से जल्दी ही खुल गई| उसने उसने जल्दी-जल्दी सब काम निबटाया और आकर दीदी के पास खड़ी हो गई| हाथ में बैग देख कर दीदी ने पूछा, “क्या है लता?”

“ दीदी मैं घर जाऊंगी|”

“ क्यों, क्या हो गया?”

“दीदी, मैं पढूंगी, अंशु और राशि की तरह मेहनत से पढूंगी| “ दृढ-संकल्प से उसका मुख-मंडल उद्दीप्त हो रहा था|

एक बारगी तो सुकेशी सकपका गई| फिर आश्चर्य वा आनंद की मिश्रित अनुभूति से उसका मन खिल उठा कि उसके घर में रह कर एक बच्चे में एक जागृति की किरण उदित हुयी, चेतना का एक अंकुर तो फूटा|

विनीत ने लता की बात सुन ली थी| उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए पूछा, “सचमे पढ़ना चाहती हो लता?”

“ जी भाई जी| खूब पढ़ना चाहती हूँ| राशि और अंशु की तरह पढ़ना चाहती हूँ|”

“तो तुम घर नहीं जाओगी, यहीं रहो, काम भी करो और पढ़ो भी| सुबह आठ बजे से एक बजे तक स्कूल, शाम को घर का काम|” ठीक! 

अगले सेशन में विनीत और सुकेशी ने प्रसन्नता पूर्वक लता को सरकारी स्कूल में दाखिला दिलवा दिया| 

पहले पहले दिन कंधे पर बैग टाँगे, और हाँथ में पानी की बोतल लिए उमंग व उल्लास से ओतप्रोत स्कूल जा रही लता को देख विनीत और सुकेशी को लता का अपने घर में रहना सार्थक लग रहा था| 

अपने घर के दो सैशन चिरागों से एक बुझे हुए दीपक को पुनः प्रज्वलित होते देख उनका हृदय फूला ना समा रहा था ||||