Saturday, 16 June 2012

दीप से दीप जले

(बाल मनोविज्ञान से संबंधित कहानी) 


सर्दियों की एक सुहावनी सी सुबह| चढ़ते सूरज की गुनगुनी धूप वरांडे में फैलने लगी थी| विनीत की नज़रें समाचार पत्र की सुर्ख़ियों पर दौड़ रहीं थी और सुकेशी जल्दी-जल्दी परिशिष्ट से सिने-तारिकओं की रंगीन तस्वीरें देख रही थी| साथ ही दोनों चाय का दैनिक कार्यक्रम निबटाने में लगे थे| तभी डोरबेल घनघनाई| विनीत ने दरवाजा खोला, किशन था| किशन यानि विनीत का रिक्शे-वाला, जो उसे रोज घर से दफ्तर और दफ्तर से घर लाता लेजाता था| आज छुट्टी के दिन कैसे? विनीत पूछने ही वाला था कि उसके ठीक पीछे एक छोटी सी लड़की और उसका हाथ पकड़े खड़ी उसकी माँ को देख विनीत ने कहा, “ आओ, अंदर आ जाओ! कुर्सी पर बैठते हुए किशन बोला, “ आपको घर के काम के लिए मददगार चाहिए ना! तो मैं ---------“ महिला की ओर देखते हुए विनीत ने सोचा ठीक है, तीस-पैंतीस की उम्र, दुबला पतला बदन, साफ़-सुथरी, भली-सी| किन्तु इतनी बड़ी महिला, शादी-शुदा महिला, बाल-बच्चों वाली महिला, चौबीस घंटे हमारे पास कैसे रहेगी, और हमें चाहिए हर वक्त का मददगार| मगर विनीत और सुकेशी के आश्चर्य की सीमा ना रही जब किशन ने कहा कि काम के लिए वह छोटी लड़की को लाया है| पति-पत्नी, दोनों की आँखें बच्ची के चेहरे पर टिक गईं| भोली-भाली मासूम सी, कृशकाय, होगी कोई ९-१० साल की| यह क्या काम करेगी? विनीत और सुकेशी ने एक-दूसरे की ओर देखते हुए आँखों ही आँखों में प्रश्न किया| किशन ने उनकी शंका को भांप लिया| “ लड़की चुस्त है साहब! जो कहेंगे वो कर लेगी| घर में सब काम यही करती है” विनीत को अश्वस्त करने की दृष्टि से किशन ने कहा|


“इसे तो स्कूल जाना चाहिए, पढ़ना-लिखना चाहिए, खेलना-कूदना चाहिए!” दया व ममता के मिश्रित भाव से सुकेशी बोली| “स्कूल जाती थी, लेकिन पढ़ाई छुड़ानी पड़ी| घर में इसके दो छोटे भाई हैं| मैं फैक्ट्री में दिहाड़ी पर काम करती हूं| पर अकेले की कमाई से गुज़ारा नहीं होता| इसी कारण इसकी बड़ी बहिन को गाँव नानी के पास भेज दिया है|” डबडबायी आँखों वा तरल स्वर में महिला ने कहा|
“इसके पापा क्या करते हैं?” स्वाभाविक सा प्रश्न था विनीत का| “वो काम करता बाबूजी, तो इसे नौकरी का शौक थोड़े ही है| कमाता-धमाता कुछ नहीं, दारू के पैसे इससे रोज़ झटक लेता है| ना दे, तो मारता है| मार-मार कर देखो, क्या हालत कार दी है इसकी!” महिला की ओर बड़ी सहानुभूति के साथ देखते हुए किशन बोला

विनीत को तरस आ रहा था माँ पर, उसकी हालत पर, बच्ची पर, जिसे इस नन्ही सी उम्र में काम पर लगाया  जा रहा है| विनीत और सुकेशी पशो-पेश में पड़ गए| इतनी छोटी लड़की से काम करवाना बाल-मजदूरी नियम के विरुद्ध तो है ही, मानवीय भावनाएं इसे स्वीकार करें, कैसे? लेकिन उनके दया रहन करने से क्या वो पढ़ने चली जायेगी? यहाँ नहीं तो कहीं और काम करेगी|
“ किशन आप दोनों के बहुत गुण गाता है| आपके साथ रहेगी तो इसकी जिंदगी सुधर जायेगी|” पति-पत्नी को चुप देख माँ ने मिन्नत के स्वर में कहा|

ज़रूरत तो सुकेशी को थी ही, वैसे भारी-काम, बरतन, झाडू-पोछा, कपड़े आदि के लिए बाइयाँ थीं, किन्तु ऊपर का काम करने और भाग-दौड़ करने के लिए भी तो कोई चाहिए| जुड़वाँ बच्चे-अंशु और राशि के जन्म के साथ ही सुकेशी आरथराइटिस की मरीज़ हो गई थी| अतः सुबह शाम ही सहायता की मौहताज थी| पहले एजेंसी की दो लडकियां रख चुकी थी, पर साल भर काम करने के बाद जो घर गईं, सो वहीँ की हो गईं| इस समय, एजेंसीवालों के पास कोई लड़की नहीं थी, तो विनीत और सुकेशी ने आपस-में सलाह कर तय किया, फिलहाल इसे रख लेते हैं| बच्चे से चाहे जो काम करवा लो, डांट-डपट कर लो, कोई कठिनाई नहीं| पूरे समय घर में रहेगी तो थोड़ा सहारा तो हो ही जायेगा|

“ क्या नाम है तुम्हारा?” सुकेशी ने बच्ची से पूछा|

“लता” मीठी-महीन आवाज़ में उत्तर मिला|

“काम करना चाहती हो?”

“हाँ”

“दिन रात यहीं रहना पड़ेगा?”

“रहूंगी!” कड़े स्वर में लता बोली|

“ मम्मी को याद करके रोओगी तो नहीं?”

“नहीं”

बच्ची का आत्म-विश्वास देख विनीत और सुकेशी ने सोचा यह प्रयोग भी क्यों ना किया जाए|
“तो कबसे काम करेगी?” विनीत ने लता की माँ से पूछा|
“ आज से, अभी से! आपके पास रहेगी, खायेगी-पीयेगी, तो मैं निश्चिन्त होकर फैक्ट्री जा सकूंगी| अकेली लड़की घर में कैसे छोडूँ बाबूजी?”

महिला की ज़रूरत और मजबूरी साफ ज़ाहिर हो रही थी| सुकेशी ने उसे आश्वस्थ करते हुए कहा, “ फ़िक्र ना करो, हमारे घर में बच्चे की तरह रहेगी”

“ तो अभी मैं चलती हूँ, शाम को इसके कपडे दे जाऊँगी|”

बेटी के सिर को प्यार से थप-थपा कर लता की माँ किशन के साथ चली गई|

लाता पहले दिन तो डरी-डरी , सहमी-सहमी रही, पर थी चैतन्य और सक्रिय| दूसरे दिन से वो दौड़-दौड़ कर काम करने लगी, मानो महीनो से घर में रहती हो| डोरबेल बजती तो आगे-आगे भागती, फोन खुद उठाती, और कायदे से बात करती, कोई आया नहीं कि पानी का ग्लास लेकर दौड़ती| लगभग सभी काम जल्दी सीख गई| संवेदनशील इतनी कि सुकेशी को सुस्त देखती तो कहती, आप लेट जाओ दीदी, मैं सब कर लूंगी| सुकेशी कराहती तो कहती, “ पैरों में मालिश कर दूं दीदी? सिर दबा दूं दीद?” अपने स्नेहिल व्यवहार से, मृदु-भाषा से और सक्रियता से जल्द ही लता ने सुकेशी और विनीत का मन मोह लिया|   

लता खूब ही खुश-मिज़ाज लड़की थी| हर समय कूदती-फांदती रहती| बातूनी भी गज़ब की| महीने में दो बार घर जाती, सिर्फ दिन भर के लिए, तो सारा घर सूना-सूना, खाली-खाली लगता| विनीत के मन में लता के प्रति विशेष स्नेह था| वह सोचते हमारे अंशु और राशि कैसे लड़ते झगड़ते हैं, हठ करते हैं, रूठते हैं और बहस भी करते हैं| अपना काम खुद करना तो जानते ही नहीं| लता में इतनी समझ, इतना बड़प्पन, इतनी सहनशीलता और काम करने की क्षमता कहाँ से आई? इसे क्या माँ-बाप की याद ना आती होगी? बच्चों के साथ खेलने के लिए क्या इसका मन ना मचलता होगा पर वह चुप-चाप खड़ी देखती और मुस्कुराती रहती है|

आई तो थी लता ऊपर के काम करने के लिए अर्थात फिल्टर से बोतलें भरना, पौधों को पानी देना, खाना टेबल पर पहुंचा देना, फिर खाली बर्तन उठाना, टेबल पोछना, भागदौड़ के काम करना, वगैरह-वगैरह पर धीरे-धीरे काफी कुछ सीख गई| चाय अच्छी बना लेती, दाल-चावल पका लेती, सुकेशी बताती जाती तो सब्जी भी बुरी ना बनती| चपातियाँ बेशक कभी श्री लंका के आकार की होतीं, कभी दक्षिण अमेरिका के, किन्तु जल्दी ही तश्तरी सी गोल गोल बिलने लगीं, बताशों सी फूलने लगी| कभी-कभी विनीत और सुकेशी आपस में बात करते कि इस वर्ग की लडकियां चाहें अधिक पढ़-लिख नहीं पातीं, किन्तु कच्ची उम्र में भी उनका व्यवहारिक ज्ञान कितना बढ़ जाता है, नन्ही-नन्ही बच्चियों की तारह चतुर व होशियार हो जाती हैं|

वैसे लता को सुकेशी से डांट भी खूब पड़ती थी| कभी दूध उबल कर गिर जाता, कभी सब्जी जल जाती, कभी कप या गिलास टूट जाता, कभी पानी का नल खुला रह जाता और कभी छत पर से सूखे कपडे उठाना ही भूल जाती| एक सुबह जब विनीत की आँख खुली तो सुकेशी मे लता पर नाराज़ हो रही थी|

“ क्या हुआ भाई?” पास जाकर धीरे से विनीत ने सुकेशी से पूछा|

“ रात को राजकुमारी जी बाहर का दरवाज़ा बंद करना भूल गई| कितनी तो घटनाएं, दुर्घटनाएं होती रहती हैं, इसे कुछ पता है! कितनी बार समझाऊँ, इसके भेजे में कुछ घुसता ही नहीं|” सुकेशी आपे से बाहर हो रही थी और लता सिर झुकाए अपराधी भाव से खड़ी थी|

“ आगे से ध्यान रखना बेटा!” विनीत ने समझते हुए लता से कहा|

“ क्या ध्यान रखेगी ये? अभी परसों गैस बंद करना भूल गई थी, आज दरवाज़ा खुला छोड़ दिया| जो घर में आग लग जाए, जो घर में कोई घुस ही पड़े|”

“ बस अब गलती नहीं करेगी| हैं ना लता? अच्छा दो कप बढ़िया सी चाय तो बना के ले आओ| ” लता को भेज कर विनीत सोचने लगा सुकेशी दिल की बुरी नहीं है, लाता को प्यार भी तोह खूब करती है, सहृदय है, नेक है| बस उसकी बीमारी ने उसे चिडचिडा बना दिया है| अतः शांत करने की दृष्टि से सुकेशी को सोफे पर अपने पास बिठाया, करुण स्वर में कहा, “कभी कभी हम लता पर बहुत ज्यादती करते हैं, उससे बहुत अपेक्षाएं रखने लगे हैं| हम चाहते हैं उसके काम में कोई भी कमी ना रहे, उससे कोई भूल ना हो| हमें याद ही नहीं रहता कि वह कोई काम करने मं अम्यस्त व अनुभव प्राप्त युवती नहीं बल्कि एक छोटी सी बच्ची है और बाप के निठल्लेपन तथा माँ की मजबूरी का खामयाज़ा भुगत रही है|

“ कभी-कभी तो ऐसी हरकतें करती है कि मैं तुम्हे क्या बताऊँ? छत की मुंडेर से लटक कर नीचे झांकती है, सीढ़ियों की रेलिंग से झूलती और उस पर फिसलती है| जो गिरी तो खुद तो मरेगी ही, हमें भी फाँसी चढ़वाएगी |” थोड़े ठन्डे क्रोध के साथ सुकेशी ने कहा|     

“ सो तो ठीक है पर है तो आखिर उल्हड़ बालिका ही| अपनी राशि से भी छोटी है| राशि कम ऊधम मचाती है क्या? लता का भी बालमन जब कभी किलोलें करने लगता है, तो ऐसी हरकतें कर बैठती है| अब तुम्हीं सोच कर देखो- जो बचपन आँगन में खेलते कूदते बिताना चाहिए, वो रसोई घर में समर्पित हो गया| खुद खाने-पीने  के दिन हैं, मौज-मस्ती के दिन हैं, पर वो स्वयं परिवार-पालक बन गई है| वैसे तुम कहो तो इसे घर वापस भेज दें, कोई और इंतज़ाम कर लें?”

“नहीं, ऐसा मैंने कब कहा, लता से अच्छी लड़की हमें कहाँ मिलेगी?”

“तो फिर लता को हम सहायक ही समझें| गैस बंद करना, दरवाज़ा बंद करना व बाकी सब जिम्मेदारियाँ मेरी और तुम्हारी| ठीक है न? “

“ हाँ!” मुस्कुराते हुए सुकेशी ने समर्थन दिया|

“ मैं तुम्हे सच कहता हूँ, सुकेशी, लता बहुत ज़हीन हैं| अगर इसे पढ़ने का मौका मिले तो ज़रूर कुछ बन सकती है|”

“ है बहुत जिज्ञासु| राशि की पुरानी कॉपी लेकर, किताब में देख-देख कर चित्र बनाती है, फिर उनमें रंग भरती है| कभी-कभी अखबार में मुख्या-समाचार पढ़ने की कोशिश करती है|” लता के प्रति सहृदयता व्यक्त करते हुए सुकेशी ने कहा|

“ अगर तुम्हारी तबियत ठीक होती तो इसे स्कूल में भरती करा देते” सुकेशी का मन टटोलना चाहा विनीत ने|

“ लता स्कूल जाने लगी तो घर का काम कौन संभालेगा?”

“ टो तुम्हीं घर में थोड़ा-थोड़ा पढ़ा दिया करो न!” विनीत का सुझाव था|

“मुझे पहले ही दो बच्चों को देखना पड़ता है” विरोध स्वरूप सुकेशी बोली|

“और जो तीन बच्चे होते तो?”

“तो उसे भी मैं पूरे मन से पढ़ाती|” मुस्कुरा कर सुकेशी बोली| “ वैसे जब मैं बच्चों को पढ़ाती हूँ तो वो भी अपनी कॉपी किताब देखती है|”

“ कोई बात नहीं, सोचेंगे इस विषय में|” विनीत टाल गया|
यों तो घरेलू सहायक के रहने, सोने के लिए अलग से एक कोठरी थी पर घर के एकदम कोने में अकेले सोने से लता कहीं डर न जाये, तो बच्चों के कमरे में ही उसके सोने की व्यवस्था कर दी गई| दरवाज़े सेजरा हट कर, दीवार से सट कर, ज़मीन पर बिस्तर बिछाकर वो सोती| दिन भर की थकी लेटते ही गहरी नीद में सो जाती| पर कभी कभी देर रात तक सोये हुए दोनों बच्चों- अंशु और राशि को हसरत भरी नजरों से निहारती रहती| वह सोचती, इतने बड़े पलंग पर, ऐसे मोटे-मोटे गद्दों पर, सफ़ेद-सफ़ेद चादर पर, मुलायम-मुलायम रेशमी रजाई ओढ़कर सोने में कितना मज़ा आता होगा| और एक सुबह बच्चों का बिस्तर बनाते बनाते बस अपने को रोक न पायी लता| लेट कर देखूं तो सही, दायीं करवट, बायीं करवट, चिंत, फिर यह हुई थी कि दीदी का तीखा स्वर सुनाई दिया “बच्चों के बिस्तर पर क्यों सोयी है?”       

“ सोयी नहीं दीदी, बस लेटी थी”

“क्यों लेटी थी बच्चों के बिस्तर पर?यह कोई लेटने का समय है? और लेटना ही है तो तुम्हारा बिस्तर अलग है न?” दीदी ने ज़रा आक्रोश के साथ कहा|

लाता सुनती रही चुप्चाप, सिर झुकाए, और सोचती रही, मेरा बिस्तर अलग है, मेरे खाने के बर्तन अलग हैं, चाय का कप और गिलास भी अलग है| क्यों हैं मेरी सब चीज़ें अलग-अलग? अंशु और राशि के दोस्त आते हैं, तो इन्ही गिलासों में पानी पीते हैं, भैया और दीदी के पास कोई आता है, तो उन्ही कपों में चाय पीते हैं, और मेहमान सब उन्ही बर्तनों में खाना खाते हैं| मुझमें कोई छूट लगी है क्या? बहुत उदास हो गई थी लता|

लता अंशु और राशि की हमउम्र ही थी| वैसे अंशु लता से थोड़ा लंबा और स्वस्थ बदन का था, और राशि कद  में थोड़ी छोटी और छरहरी थी| रूप रंग में तीनो सामान थे| लता रहती भी साफ़-सुथरी और तलीके से| यहाँ तक कि परिवार के मित्र कभी कभी लता को राशि समझ लेते या राशि की सहेली| अंशु और राशि सुबह सुबह वैन में स्कूल जाते| भाग-भाग कर वैन में चढ़ते बच्चों को लता निहारती रहती| वैन में दूसरे बच्चों को देख मुस्कुरा देती| एक दिन किसी बच्चे ने पूछ ही लिया, “ तुम स्कूल नहीं जाती?” कुछ नहीं बोली लता पर मन-ही-मन कहा जाती थी, इसी तरह तैयार होती थी, लेकिन वैन में नहीं पैदल जाती थी| स्कूल से ड्रेस मिलती थी, किताबें मिलती थीं. दोपहर का खाना भी मिलता था| मैडम पढ़ाती तो थीं किन्तु मारती बहुत थीं, क्योंकि हम पढ़ते ही नहीं थे| पढ़े कैसे? घर जाओ तो मम्मी काम में लगा देतीं| घर में हमें कोई पढ़ाने वाला भी नहीं था| मेरी मम्मी हिंदी ही नहीं पढ़ीं, अंग्रेजी या गणित कैसे पढ़ातीं? अंशु और राशि को तो उनके मम्मी और पापा दोनों पढ़ाते हैं| सच पूछो तो हमें न स्कूल जाना अच्छा लगता था, न पढ़ना| जी चाहता खेलो, और खेलते ही रहो| लेकिन अब लगता है क्यों नहीं पढ़ती थी? अंशु और राशि के पास इतनी अच्छी-अच्छी किताबें हैं, टेबल कुर्सी पर बैठ कर पढ़ते हैं| स्कूल में भी टेबल-कुसी पर बैठ कर पढ़ते होंगे| हम तो ज़मीन पर बैठ कर पढ़ते थे| हमारा स्कूल टेंट में लगता था न! मैं भी अंशु और राशि के जैसे स्कूल में क्यों नहीं पढ़ सकती? पढ़ने वाले बच्चों को सब प्यार करते हैं| आते ही पूछते हैं, किस क्लास में हो? मुझसे कोई नहीं पूछता| अंशु और राशि के लिए सब चौकलेट लाते हैं, टॉफी लाते हैं, बिस्किट लाते हैं, मेरे लिए कोई कुछ नहीं लाता| जो बच्चे पढ़ते हैं, उन्हीं को तो सब प्यार करते हैं| मैं पढ़ती नहीं इसीलिए मुझे कोई प्यार नहीं करता| कोई मेरे लिए चौकलेट क्यों लाएगा?
छुट्टी के दिन अंशु और राशि देर तक सोते थे| उठते तो टीवी देखते| शाम को भी देखते, रात को भी देखते| लता सोचती जब मैं रोज सुबह ६ बजे उठती हूँ तो छुट्टी के दिन मैं भी देर तक क्यों नहीं सो सकती? टीवी के सामने ज़रा सा खड़ी हो जाती हूँ, तो दीदी चिल्लाती हैं, “तू क्या कर रही है यहाँ? चल अपना काम कर!” क्यों होता है ऐसा? लता सोचती पर कुछ निष्कर्ष न निकाल पाती| थी तो आखिर अबोध बालिका ही|

बच्चे एक दिन फल खा रहे थे| अंशु के हाथ में संतरा था, राशि ने केला उठाया| एक सेब लता ने भी ले लिया| चार में से तीन सेब देख दीदी ने पूछा, “ सेब किसने लिया?”

“मैंने लिया” लता बोल पड़ी|

“ अपने आप से क्यों लिया?तुझे हम देते तो हैं हर चीज़, पर चोरी से खाने की आदत नहीं जाती| कभी चौकलेट उठा लेती है, कभी बिस्किट, कभी फल” सुकेशी लता को डपट रही थी|

“ मैं कहाँ चोरी से उठाती हूँ, सबके स्स्मने लेती हूँ, सबके सामने खाती हूँ|”

लता की रोती सूरत देख सुकेशी थोड़ा नरम होकर बोली, “ जो चीज़ चाहिए हो, मांग लिया करो| अपने हाथ से बिना पूछे उठाना चोरी होती है| समझ गई न?”

सिर हिला कर लता ने सुकेशी को तो आश्वस्त कर दिया, मगर उसका मन विचलित हो गया| अंशु और राशि अपने अप्प, अपने हाथ से सब चीज़ें अलमारी से, फ्रिज से, निकाल-निकाल कर लेते हैं तो वो चोरी नहीं होती, मैंने एक सेब उठा लिया तो चोरी हो गयी| वो बच्चे हैं, मैं बच्ची नहीं हूँ? उन्हें भूख लगती है, दिन-भर टॉफी, बिस्किट, चॉकलेट, चिप्स खातें हैं, मुझे भूख नहीं लगती? बहुत आहत हो गई थी लता!

उसकी आँखों से झर-झर आंसू बहने लगे| भावना का तूफ़ान थमा तो उसे कई दिन पहले की घटना याद आ गई| बच्चे फ्रूट केक खा रहे थे| लता को भी एक टुकड़ा मिला| उसे फ्रूट केक अच्छा लगा| “दीदी मुझे और केक चाहिए” बड़े मन से सुकेशी से कहा| “अभी दिया था न!बचेगा तो दे देंगे” लापरवाही से बोली सुकेशी| लता चुप रह गई और ललचाई आँखों से देखती रही और सुनती रही| “ और लो न!” सुकेशी ने राशि से कहा| “बस चार स्लाइस से तुम्हारा मन भर गया, चलो कोई बात नहीं शाम को खा लेना” अंशु से कहा और सुकेशी ने बाकी बचा केक फ्रिज में रखवा दिया| लता सोचती रही दीदी ने मम्मी से कहा था चिंता ना करो, हमारे बच्चे की तरह रहेगी, लेकिन कहाँ हूँ मैं बच्चे की तरह? मुझसे कहा था जो चाहिए वो मांग लिया करो| मांगो तो घुड़क देती हैं| ठीक है, अब तक चोरी नहीं की, अब ज़रूर छिप कर खाऊँगी, चुरा-चुरा कर खाऊँगी| भावावेश में लता फिर बिलख-बिलख कर रोने लगी|

उस दिन अंशु और राशि को रिपोर्ट कार्ड मिले थे| दोनों अच्छे अंकों से पास हुए थे| पहले तो घर में खूब हो-हल्ला हुआ, खूब हँसी, खिल-खिलाहट हुई, खूब चुम्मी-पप्पी हुई| फिर शाम को भैया-दीदी सब को कार में बिठा कर घुमाने ले गए| लता को भी ले गए| मोटर में घूमने में लता को बहुत मज़ा आया| पहले सब ने फ्रूटी पिया, फिर पार्क में दौड़े, खेले, झूला-झूले, फिर रेस्टरौ में खाना खाया और सबसे अंत में आइस-क्रीम| लता को भी सब कुछ खाने को मिला, बेशक उसे अलग बिठाया गया| आइस-क्रीम भी मिली, भले ही छोटा कप दिया गया|

लता ने देखा रेस्टरौ मैं बहुत भीड़ है| सभी भर-भर प्लेट खाना खा रहे हैं| पूड़ी-सब्जी, छोले-भठूरे, इडली साम्भर- और भी ना जाने क्या क्या, जिनके नाम भी वो नहीं जानती| कहाँ से आते हैं इन लोगों के पास इतने पैसे? उसके मन में सवाल उठा| यहाँ सभी लोग मोटर पर आते हैं| घर में भी भैया-दीदी के पास कई लोग मोटरों मैं ही आते हैं| एक मोटर कितने की आती होगी? ज़रूर बहुत महँगी होती होगी! अचानक लता का ध्यान जूठे बर्तन उठाने वालों की ओर गया| लोग कैसे इतरा–इतरा कर खाते हैं, और ये बेचारे दौड़-दौड़ कर टेबल पोछते हैं, पानी देते हैं, जूठे बर्तन उठाते हैं| अच्छा अब समझ में आया| ये लोग भी मेरी तरह पढ़े, लिखे नहीं हैं तभी तो इनकी हालत और मेरी हालत एक जैसी है| मैं भी तो जूठे बर्तन उठाती हूँ, टेबल पोछती हूँ, पानी पिलाती हूँ|
खा-पी कर सब घर आ गए| रात बिस्तर में लेटी लता तो उसके दिमाग में रेस्टरौ का दृश्य उभरता रहा| जूठे बर्तन उठाने वाले लड़के याद आते रहे, हचक-हचक कर खाने वाले लोग याद आते रहे| फिर वो सोचने लगी सब लोग कितने खुश थे| आंटी और अंकल लोग कैसे आपस में घुल-मिल कार बातें कार रहे थे| सब लोग बच्चों को कैसे दुलरा-दुलरा कर खिला रहे थे| घर में भी भैया और दीदी बच्चों से कितना प्यार करते हैं| मेरे पापा क्यों हमें प्यार नहीं करते? क्यों मम्मी से अच्छी-अच्छी बातें नहीं करते? मेरे पापा-मम्मी भी क्यों इन लोगों की तरह अच्छे-अच्छे कपडे नहीं पेहनते? पापा तो बस शराब पिए पड़े रहते हैं, गालियाँ देते हैं, और लड़ाई-झगड़ा करते हैं| हाँ मैं समझ गई| पापा पढ़े लिखे नहीं है ना, तो वो जानते ही नहीं कि शराब बुरी चीज़ है, कि पढ़ने से अच्छी नौकरी मिलती है| अच्छी नौकरी होगी तो अच्छा खाने को मिलेगा, अच्छा बिस्तर सोने को मिलेगा| पढ़े-लिखे लोग हमारे जैसे झुग्गी-झोपडी में थोड़े ही रहते हैं? इसका मतलब अच्छी जिंदगी चाहिए तो पढ़ना-लिखना चाहिए! मैं पढ़ी नहीं तो क्या मैं हमेशा जूठे बर्तन उठाती रहूंगी, टेबल पोछती रहूंगी? सोचते-सोचते जाने कब उसकी नींद लग गई|

सुबह लाता की आँख रोज से जल्दी ही खुल गई| उसने उसने जल्दी-जल्दी सब काम निबटाया और आकर दीदी के पास खड़ी हो गई| हाथ में बैग देख कर दीदी ने पूछा, “क्या है लता?”

“ दीदी मैं घर जाऊंगी|”

“ क्यों, क्या हो गया?”

“दीदी, मैं पढूंगी, अंशु और राशि की तरह मेहनत से पढूंगी| “ दृढ-संकल्प से उसका मुख-मंडल उद्दीप्त हो रहा था|

एक बारगी तो सुकेशी सकपका गई| फिर आश्चर्य वा आनंद की मिश्रित अनुभूति से उसका मन खिल उठा कि उसके घर में रह कर एक बच्चे में एक जागृति की किरण उदित हुयी, चेतना का एक अंकुर तो फूटा|

विनीत ने लता की बात सुन ली थी| उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए पूछा, “सचमे पढ़ना चाहती हो लता?”

“ जी भाई जी| खूब पढ़ना चाहती हूँ| राशि और अंशु की तरह पढ़ना चाहती हूँ|”

“तो तुम घर नहीं जाओगी, यहीं रहो, काम भी करो और पढ़ो भी| सुबह आठ बजे से एक बजे तक स्कूल, शाम को घर का काम|” ठीक! 

अगले सेशन में विनीत और सुकेशी ने प्रसन्नता पूर्वक लता को सरकारी स्कूल में दाखिला दिलवा दिया| 

पहले पहले दिन कंधे पर बैग टाँगे, और हाँथ में पानी की बोतल लिए उमंग व उल्लास से ओतप्रोत स्कूल जा रही लता को देख विनीत और सुकेशी को लता का अपने घर में रहना सार्थक लग रहा था| 

अपने घर के दो सैशन चिरागों से एक बुझे हुए दीपक को पुनः प्रज्वलित होते देख उनका हृदय फूला ना समा रहा था ||||

Sunday, 10 June 2012

यात्रा




जम्मूतवी ट्रेन जैसे ही प्लेटफोर्म पर पहुंची, समीर के भाई-भाभी, दोनों बहेनें भावना और कामना तथा भतीजी आरुषि स्लीपर कोच नंबर १७०४ की ओर भागे | गाड़ी दो घंटे देर से पहुँची थी अतः ये लोग बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे थे | और क्यों ना करते? तीन साल बाद सुलेखा और समीर घर लौट रहे थे | गए तो दो थे, किन्तु वापिस आ रहे थे तीन| इसी लिए सब के सब समीर और सुलेखा की अपेक्षा छोटे बच्चे सजल को देखने के लिए अधिक उत्सुक थे | आठ महीने के सजल को लेकर सुलेखा जैसे ही ट्रेन से उतरी, भावना ने झपट कर उसे गोद में ले लिया और चूम कर पुचकारने लगी | कामना और आरुशी भी बारी-बारी उसे गोद में लेकर उछाल-उछाल कर खिलाने लगीं | भाई-भाभी सामान उतारने में और कुली तय करने में समीर की मदद कर रहे थे | जैसे तैसे सब घर पहुंचे और अब बालक का पूर्ण निरीक्षण कर सब अपना अपना विचार प्रकट करने लगे| दादी माँ ने सजल को गोद में लेते हुए कहा, “आ बेटा! बड़ा इन्तज़ार कराया तूने|” फिर स्निग्ध भाव से बोलीं, “प्यारा बच्चा है | छोटे में समीर भी तो ऐसा ही गोल-मटोल और सुंदर था | ” दादी माँ की गोद से अब सजल अपनी पर-दादी अर्थात समीर की दादी की गोद में था| प्यार से निहारते हुए वे बोलीं, “इसका माथा और होंठ समीर जैसे हैं पर आँखें भाभी की तरह हैं बड़ी बड़ी |” कामना की राय थी, “पैर के पंजे भी तोह चाची जैसे हैं” तोतली सी वाणी में आरुशी ने कहा| “ अपने समीर और सुलेखा सांवले सलोने और बच्चा ऐसा गोरा चिट्टा |” दादी ने कहा तो उनके जवाब में दादाजी बोले, “अरे आबहवा का असर पड़ता है कि नहीं? काश्मीर में तो सभी गोरे, खूबसूरत होते हैं |” इस बीच चाय नाश्ते का दौर चलता रहा, सामान यथास्थान रखना जारी रहा और सजल को लेकर तरह-तरह की टीकटिप्पणी भी होती रही | समीर की दादी कुछ अधिक ही आहलादित थीं | नाश्ते के पश्चात अपनी रोज़ की दवा खाते हुए बोलीं, “कश्मीर प्रवास समीर और सुलेखा के लिए और हम सबके लिए भी बड़ा ही भाग्यशाली रहा | यहाँ तो हम पाँच साल तक सुलेखा का इलाज कराते रहे, पूजापाठ कराते रहे, मन्नतें मांगते रहे | जिसने जो बताया वाही करते रहे | दोनों की डॉक्टरी जाँच भी हो गयी थी और डॉक्टर के सुझाव से बेचारी का ऑपरेशन भी करवा दिया | पर इसकी ना कोख हरी होनी थी, ना गोद भरनी थी | “श्रेय तो कश्मीर को मिलना था ना”, प्रसन्नमुख भाभी ने सुलेखा को छाती से लगाते हुए कहा| फिर बोलीं, “सच-मुच वहाँ की आबहवा में बड़ा दम है | खिला या पिलाया भी अच्छा समीर ने | तभी ना सजल इतना स्वस्थ और इतना प्यारा है | सजल भाभी की गोद में था और कामना, भावना तथा घर के नौकर-चाकर सब उन्हें घेर खड़े थे | टकटकी बांधे सजल को निहार रहे थे | कहीं नज़र ना लग जाए सो दादी माँ ने झट से ‘राई-नोन’ लेकर बच्चे की नज़र उतार दी | माथे पर दायीं ओर काला डिठोना भी लगा दिया | और दोनों हाथों से बलैयाँ ले उँगलियाँ कनपटी से लगा कर चटका दीं |

समीर का तबादला श्रीनगर से मद्रास हो गया था | छै हफ्ते का जॉइनिंग टाइम मिला था | घर में छोटा बच्चा हो और सर्दियों का मौसम, तो दिन कब निकलता है, कब ढल जाता है, पता नहीं चलता | खाते-पीते, मिलते-जुलते, खेलते-खिलाते, छै हफ्ते झट से बीत गये | सुलेखा और समीर सामान पैक करने में लग गए | कुछ सोचते-विचारते एक दिन दादीजी बोलीं, “जो थोड़े समय के लिए ये लोग कश्मीर ही रह जाते तो कितना अच्छा होता |” भाभी दादीजी का मंतव्य भांप गईं| खिलखिलाते हुए बोलीं, “कोई बात नहीं दादीजी, मद्रास से सजल के लिए श्यामली सुंदरी बहिन लाएगी सुलेखा | हैं ना सुलेखा?” सुलेखा शर्मा गयी|

नियत तिथि पर समीर और सुलेखा मद्रास के लिए रवाना हो गए | सुलेखा की गोद में सुंदर, स्वस्थ और चंचल सा बच्चा सहयात्रियों का ध्यान आकर्षित कर रहा था | सुलेखा कभी उसे बिस्कुट देती, कभी झुनझुना पकड़ाती, कभी गोद में लिटा कर थपकियाँ दे सुलाने की कोशिश करती | पर ट्रेन के कम्पार्टमेंट का वातावरण सजल को रास नहीं आ रहा था और वह मचल कर रोने लगा तो समीर ने गोद में ले लिया और तरह-तरह की भाव भंगिमायें बना कर उसे बहलाने लगा | फिर भी कुछ ना हुआ तो, कम्पार्टमेंट में घूमने लगा | सुलेखा बर्थ पर पैर पसार कर लेट गई | तड़के उठी थी, कल सारा दिन तैयारी में व्यस्त थी, अतः थकान के कारण थोड़ा सोना चाहती थी पर चलती गाड़ी के हिचकोले और शोर-शराबा नींद में व्यवधान बन रहे थे | आँखें बंध थीं, गाड़ी दक्षिण की ओर भाग रही थी पर सुलेखा का मन विपरीत दिशा में दौड़ने लगा|

आज से तीन साल पहले भी वह ट्रेन में बैठी कश्मीर जा रही थी | डिब्बे में तमाम से सहयात्री थे पुरुष भी, महिलाएं भी और छोटे बच्चे भी| सामने वाली बर्थ पर  एक महिला नन्हे शिशु को कभी बोतल से दूध पिलाती, कभी उसकी नेपी बदलती, कभी बाँहों में झुलाती और कभी गुनगुना-गुनगुना कर थपक थपक कर बच्चे को सुलाने की कोशिश करती | सुलेखा का मन होता वो कहे दीदी, बच्चे को दूध मैं पिला दूं, नेपि मैं बदल दूं! लाओ दीदी, बच्चे को मैं सुला दूं! उसे लगता था कि वो बच्चे को खूब दुलराए, बेबीटाक करे पर कैसे? अगर सामने वाली माँ को मालूम हुआ कि वह बाँझ है, निपूती है, तो शायद उसकी छाया से भी परहेज करे| अतः मन मारे बैठी रही | बगल वाली महिला की बेटी चंचल थी | बार बार आकर सुलेखा की साडी खीचती, उसकी बर्थ पर चढ़ने की कोशिश करती, किन्तु सुलेखा ने संकोचवश उसे छुआ तक नहीं| वैसे संकोच काहे का | जो किसी ने पूछा, तो कह देगी उसके दो बच्चे हैं | दादी के पास छोड़े हैं | नई नौकरी नई जगह, वो भी ठंडी बर्फीली, बच्चों के लिए ठीक नहीं | फिर सोचा क्यों बोले झूठ, किसलिए बोले झूठ! जो है, सो है | फिर भी सुलेखा को यह स्वीकार नहीं था कि उसे निस्संतान जान कर कोई उस पर तरस खाए या तिरस्कार से उसे देखे या अपने बच्चों को उससे अलग रखे जैसा कि एक-दो बार उसके साथ हो चुका था| चाहे ऐसा हुआ हो अनजाने में ही, पर सुलेखा को ऐसा ही लगता था | अब वो नई जगह जा रही है | वहाँ भी उसे अवहेलना के साथ देखा जायेगा, उसके स्त्रीजीवन की सार्थकता में कमी समझी जायेगी | मात्रिपद नहीं मिला तो, उसका नारी जीवन व्यर्थ अथवा अधूरा माना जायेगा | वहां भी सब महिलाएं अपने बच्चों को उससे परे रखेंगी| सोच-सोच कर सुलेखा का सिर चकराने लगा था, आँसू बहने लगे थे | सोचते-सोचते सुलेखा के अब भी आँसू निकल पड़े पर इसी बीच वो चंचल बच्ची सूटकेस से टकरा कर गिर पड़ी और चीख-चीख कर रोने लगी थी | उसकी चीखें सुन कर सुलेखा आपे में आ गई | माँ आसपास दिखी नहीं| झट से बच्ची को गोद में उठाया, उसकी चोंट पर फूँक मारी, और कुछ नहीं हुआ-कुछनहीं हुआ कहकर बच्ची को छाती से चिपटा लिया | बच्ची धीरे धीरे चुप हो गई और सुलेखा को बहुत अच्छा लगा| माँ आई तो बच्ची लपक कर माँ की गोद में चली गई, फिर अपनी दुनिया में, कल्पना की दुनिया में लौट गई |
                 
   समीर सुलेखा का दर्द समझता था, उसकी व्यथा को दूर करने के लिए कुछ भी कर सकता था, कुछ भी | पर वो करे तो क्या करे? एक दिन उसने समझाना चाहा, “अपने मन को इस तरह त्रास नहीं दो, लेखा! अपने पास सब कुछ है, बच्चा ही तो नहीं है! सो तुम मुझे अपना बच्चा समझ लो, मैं तुम्हे अपना बच्चा मान लूंगा!” बड़े प्यार के साथ समीर ने उसे राहत देना चाही थी | पर सुलेखा ने लपाक से जवाब दिया, “ऐसे समझने और मानने से क्या होता है?” और फूट-फूट कर रोने लगी थी | सुलेखा के दुःख से दुखी होकर उसने फिर एक सुझाव दिया, “क्यों ना हम एक बच्चा गोद ले लें |”
“नहीं!”, सुलेखा ने कह | “दूसरे के बच्चे के साथ हम कितने ईमानदार रह सकेंगे, उसे कितना अपना समझ सकेंगे | और वह भी बड़ा होकर हमें कितना अपनाएगा? अच्छा निकला तो ठीक, ढंग का ना निकला तो कहा जाएगा कि अपना होता तो मन से पाला होता | ना, बाबा ना | मुझे नहीं चाहिए बच्चा-वच्चा | यह झंझट मैं नहीं पाल सकती |” पर सुलेखा दुखी तो थी और दुःख की छाया उसके चेहरे पर स्थायी रूप से बनी रहती |

समीर सोचता था, कश्मीर पहुँच कर सुलेखा का मन बदल जाएगा | यहाँ की हरी-भरी वादियों में दोनों घूमेंगे, झीलों पर मोटर बोट से सैर करेंगे और खूब खुश रहेंगे | पर सुलेखा उदास रहने के साथ-साथ अब खीजी-खीजी भी रहने लगी थी | बात-बात पर बेवजह झल्लाती रहती और हीन-भावना से ग्रस्त रहती | स्त्रियों की अपेक्षा आम तौर पर पुरुष अधिक व्यवहारिक व शीघ्र निर्णय लेने वाले होते हैं | सुलेखा किसी मानसिक रोग से ग्रस्त हो, इससे पहले ही कोई ना कोई कदम तो उठाना ही होगा | समीर इसी उधेड़ बुन में उलझा रहता|

गाड़ी किसी स्टेशन पर रुकी थी | स्टेशन छोटा हो या बड़ा, वही भागम-भाग, वही धक्कमपेल, खोमचों वालों की आवाजें और वही भिखारियों का गिडगिडाना | समीर नीचे उतर कर दो ग्लास चाय और समोसे ले आया | दोनों ने आराम से चाय पी| बच्चे को सुलेखा ने बर्थ पर सुला दिया था | समीर भी आराम करने ऊपर की बर्थ पर चला गया | सुलेखा कभी सोये हुए सजल की विभिन्न मुद्राएं देखती, कभी खिडकी से बाहर के दृश्यों को आँखों में भरती, कभी सहयात्रियों के आपसी वार्तालाप का आनंद लेती | धीरे धीरे वह फिर अतीत में पहुँच गई |

वह सकपका गई थी जब समीर ने उससे किचिंत आक्रोश में कहा था, “या तो दिन-रात इसी तरह बिसूरते रहो, या परिस्थिति को अपना प्रारब्ध मान स्वीकार कर लो और हँसी-खुखी जिंदगी बिताओ, या फिर परिस्थिति बदलने का उपाय करो |” क्या उपाय करे, वह सोच रही थी कि समीर ने कहा, “देखो लेखा, आजकल विज्ञान के बहुत तरक्की कर ली है, हमें भी भावुकता छोड़ कर वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिये |” सुलेखा टकटकी बांधे उसे देखती रही और सुनती रही |

“जो दम्पत्ति किसी कारणवश संतान बिना रह जाते हैं, तो ऐसे उपाय हैं कि वे भी माता-पिता बन सकें |” सुलेखा बोली कुछ नहीं पर आँखों में प्रश्न थे कैसे? किस तरह? समीर ने कहा, “विदेशों में तो आम बात है | अपने यहाँ अभी चलन कम है | फिर भी प्रयोग यहाँ भी हो रहें हैं और खूब हो रहे हैं|

“कैसे बन सकते हैं माता-पिता? “ सुलेखा का प्रश्न था |

“ किसी की कोख उधार पर लेकर, या किराये पर लेकर | कितने ही दम्पत्ति इस प्रकिया द्वारा माता-पिता बन संतान सुख भोग रहे हैं |”

“यह कैसे हो सकता है?”

“हो सकता है और हो रहा है | असल में तुम अखबार-वगैरह ज्यादा पढ़ती नहीं, तो तुम्हें इन बातों की जानकारी कम है |”

“ लेकिन ये भी दूसरे का बच्चा हुआ ना! एक तरह से गोद लिया हुआ |”

“ हाँ! पर वह बच्चा पचास-तिशत तो अपना होगा | जन्मदात्री कोई और होगी, पर माँ तो तुम ही रहोगी और पिता मैं”, समीर ने थोड़ा झिझकते हुए कहा |

“ यह तो अनैतिकता होगी | रहने दो, अबसे मैं कभी बच्चे की चर्चा नहीं करूंगी, न उसके विषय में मैं सोचूंगी” थोड़ा तैश में बोली सुलेखा |
   
“ इसमें अनैतिकता जैसी कोई बात नहीं, जो कुछ करना है, डॉक्टरों को करना है, मुझे नहीं | ज़रा समझने की कोशिश करो लेखा!”

सुलेखा सोच विचार में पड़ गई थी | ना खुश हो पा रही थी, ना स्वीकार कर पा रही थी | माँ बनने की साघ इतनी बलवती थी कि इनकार भी नहीं कर पा रही थी | उसने शंका व्यक्त की, “घर में मालूम होगा तो सब क्या कहेंगे? 

“ कहेंगे तो, तब जब मालूम होगा | वहाँ कौन खबर करने जाएगा? और मालूम हो तो हो, बल्कि हमे खुद बता देना चाहिए| कोई चोरी तो है नहीं, डाका तो डाल नहीं रहे |”

लेखा का मन फिर भी सौ-प्रतिशत हामी नहीं भर रहा था | उसने समीर से कहा “दूसरे के बच्चे के लिए कोई महिला नौ-दस महीने के लिए कष्ट भोगने और ज़िम्मेदारी उठाने के लिए क्यों तैयार होगी?”

“ किसी का बच्चा अपनी कोख में रखना आसान काम नहीं है पर कई महिलायें खुशी-खुशी यह काम करती हैं | सेरोगट मदर कहते हैं उन्हें | सेरोगेट मदर और सेरोगेसी प्रक्रिया के बारे में समीर ने सुलेखा को समझा दिया |”

“ लेकिन यह काम वह मन से तो करेगी नहीं, और बेमन से पनपने वाले बच्चे के संस्कार क्या बनेंगे?”

“ जन्म माता-पिता देते हैं, पर बच्चे अपने अतीत के साथ आते हैं, उनके पिछले जन्म के संस्कार भी होते हैं | फिर बच्चों का विकास, उनके पालन-पोषण, शिक्षा-दीक्षा पर भी निर्भर करता है | वैसे तुम देखो, एक ही माता-पिता, एक सा वातावरण, एक जैसी देखभाल, फिर भी एक बच्चा होनहार निकलता है, एक बिलकुल नालायक | एक सुशील, सहृदय, सुसंस्कृत, तो दूसरा संकुचित, मनोवृत्ति वाला, उद्दंड व अहँकारी | एक दस जन्म आगे, एक दस जन्म पीछे |”

 “बच्चा क्या निकलेगा, कैसा होगा, यह तो बाद की बात है | अभी तो यह विचार करना है कि हमें क्या यह कदम उठाना चाहिए? ज़रा शांति के साथ, ठन्डे दिमाग से सोचना, इस विषय में |”
“बस एक सवाल और पूछती हूँ | जिस माँ ने बालक को जन्म दिया, उसे उससे मोह न होगा? वे कैसे खुशी-खुशी उसे दूसरों को दे देगी?”

“ थोड़ा बहुत लगाव तो अवश्य हो जाता होगा मगर ये सेरोगट मदर कहलाती हैं | एक तरह से यह उनका धंधा होता है | जीविका उपार्जन का साधन | कई एक करुणा तथा परोपकार की भावना से भी कोख उधार देती हैं |”

“ और जो बाद में कोई झगड़ा-फसाद हुआ?”

“ कैसे? न माँ को यह मालूम कि उसके गर्भ में किसका बच्चा है, ना यह मालूम कि बच्चा किसको दिया गया है, न पिता को मालूम कि बच्चे की जन्मदात्री कौन है और ना ही बच्चे को कभी बताया जाएगा कि उसकी माँ कौन है, तो फिर झगड़ा कैसे ओर क्यों? और थोड़ा सोच विचार के बाद सुलेखा सहमत हो गई थी |

यथ्समय सूचना दी गई कि घर में सभी की प्रोन्नति होने वाली है | दादी माँ पर-दादी बनने वाली हैं, माँ दादी| बहने बुआ और आरुषि दीदी | दादाजी बड़े दादा और पापाजी बड़े पापा तो बन ही जायेंगे | घर में खुशी की लहर दौड़ गई | तत्काल समाचार भेजा गया कि सुलेखा की देख-भाल के लिए माँ कश्मीर पहुँच रहीं हैं |

“ नहीं, समीर ने जवाब दिया | यहाँ ठण्ड बहुत है, माँ बीमार पड़ जायेंगी | सुलेखा की  देखभाल अच्छी हो रही है | प्रवासकाल निकट आया तो भाभी ने प्रोग्राम बनाया पर समीर ने उन्हें भी रोक दिया | आर्मी अस्पताल में किसी को कुछ करने की ज़रूरत ही नहीं होती बल्कि वहाँ कोई जा ही नहीं पाता | फिर क्यों तकलीफ की जाए?”

और यथासमय सुंदर सा प्यार बेटा सुलेखा की गोद में आ गया | गाड़ी भागी जा रही थी दक्षिण की ओर | सुलेखा ने देखा सजल गहरी नींद में बर्थ पर सोया हुआ था | सुलेखा सोच रही थी कितना अंतर है पिछली यात्रा में और इस यात्रा में| तब उसका मन कितना अवसाद भरा था, लितना खिज्ज | आज वे कितनी तृप्त है, कितनी संतुष्ट | गाड़ी की गति धीमी होने लगी थी सो | समीर उतर कर उसकी बगल में बैठ गया था | इस बीच सजल भी कुनमुनाने लगा तो दोनों थापकियाँ देकर उसे फिर से सुलाने का उपक्रम करने लगे पर उसकी नींद पूरी हो गई थी | सुलेखा ने उसे गोद में ले लिया और समीर उससे खेलने लगा| सुलेखा ने आनंद मिश्रित स्वर में कहा, “माँ कह रही थी सजल तुम पर गया है और दादी का कहना था मुझपर |”

“ किसी पर गया हो, बेटा तो हम दोनों का हैं ना?”

“हाँ समीर, उस अनजान सेरोगट मदर को हमारा शतशत प्रणाम, कोटिश धन्यवाद जिसने हमारी नीरस, वीरान जिंदगी को खुशहाल बना दिया| न केवल जीवन को मधुर व सरस बनाया बल्कि संपूर्णता का एहसास भी दिला दिया|” समीर ने समर्थन में कहा|

“ उसके और उसके परिवार के प्रति तथा एसी अन्य माताओं के प्रति हमारी अनेकानेक शुभकामनाएं|”

 और दोनों ने सजल को भावविभोर हो चूम लिया |||