अभी कल तक घर में
कितना धूम धड़ाका था| लोगों का आना जाना, फोन पर फोन, मोबाइल से अलग, लैंड लाइन से
अलग, कोरियर व साधारण साक से आई चिट्ठियाँ, इत्यादि| खाना पीना, हँसना बोलना,
बच्चों का हो हल्ला, सब| फिर भी माहौल ग़मगीन, दुःख की स्थायी सी छाया| घर में जैसे
मेला लगा हुआ, फिर भी एक तरह का सन्नाटा, विचित्र सा सूनापन| दिल सबके भारी, पर
दीपा| उसके दिल की हालत कौन समझ सकता था? उसकी पीड़ा, उसकी वेदना, उसकी तड़प वाही
जानती थी| अभी हफ़्ते भर पहले एक जिंदगी में न्बहार ही बहार थी, अचानक वीरानी आ गई|
एक झटके के साथ खूबसूरत सा आशियाना तिनके तिनके बिखर गया| हुआ क्या आखिर? यही न कि
कल तक वो थे, आज नहीं हैं|
उसे शोकसभा कहें, या
प्रार्थना सभा, या चौथा, जो भी हो, दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि के साथ साथ कुछ
उनके श्रेष्ठ स्वभाव व सद्कर्मों कि चर्चा हुई, कुछ संसार की क्षणभन्गुरता पर
प्रवचन हुए, कुछ भजन व चेतावनी गीत गाये गये और अंत में परिवार जनों के प्रति
संवेदना व्यक्त करते हुए सभा विसर्जित हो गई| धीरे धीरे नाते रिश्तेदार, जो यह
अप्रिय समाचार सुनकर भागे भागे आये थे, उसी तरह जल्दी जल्दी लौट गए| रह गई अकेली
दीपा, अपने दो अबोध बच्चों के साथ, मासूम सी चार वर्ष की श्रृतु और भोला भला सात
वर्ष का अनूप|
कहने को अकेली थी
दीपा पर योगेश की यादें उसे अकेले कहाँ रहने देती थीं? एक अकेलेपन का दुःख हो तो
झेल ले, वियूग की पीड़ा हो तो सेहन कार ले, वो तो ऐसे मझधार में फँस गई थी कि
किनारा दूर दूर तक नजर नहीं आ रहा था| योगेश के साथ जुड़ी मधुर स्मृतियाँ तो उसे
व्यथित करतीं ही, सामने जो समस्यायें थीं उनके कारण व्याकुलता से उसकी नींद हराम
हो गई थी, भाख गायब हो गई थी| कहाँ चले गाये योगी? क्यों चले गए? वापस आ जाओ, एक
बार बस एक बार| दीपा चाख चीख कार रो पड़ती|
पड़ोसी सहेली सविता
बच्चों के लिए खाना ले कार आई थी| सविता सहृदय है| दीपा कि हम उम्र, अंतरंग सहेली
है| दीपा को तपते देखा तो खुद भी तड़प उठी| “न रो दीपा” उसे अंक में लेते हुए सविता
ने कहा|
“रोने से तेरा योगी
वापस आ जाएगा क्या?अब बच्चों का मुँह देख और हौसला रख|”
“मुझे कुछ नहीं
मालूम सविता, योगेश का रुपयों-पैसों का क्या हिसाब किताब है, मकान के कागज़ात कहाँ
रखे हैं? डायरी देखि पर मुझे समझ में नहीं आता” दीपा ने रोते हुए कहा|
“तू बिलकुल न घबरा|
मैं हूँ न! ये हैं न! तेरी मुसीबत हमारी मुसीबत है, तेरी समस्या हमारी समस्या है|
हम सब मिलकर समस्याओं से निबटेंगे| थोड़े दिनों में सब ठीक हो जाएगा| हाँ!”
दीपा थोड़ा आश्वस्त
हुई| धीरे से बोल, “योगेश को मैं कितना समझती थी कि अच्छा भला आदमी बाहर जाता है,
शाम को सही सलामत घर लौट आएगा इसका क्या भरोसा? पिछले साल जब तुम लोगों ने पौलिसी
ली थी, मैंने भी बहुत कहा बीमा करा लो, पर ये टालते रहे| बड़ी दीदी व जीजाजी ने
मेडीक्लेम कराया था तब भी बहुत जोर डाला, पर नहीं तो नहीं|”
दीपा के आँसू फिर बह
चले थे| पल्लू से पोछे और फिर धीरे से बोली, “मैंने कई बार कहा राम न करे, अगर
तुम्हें कुछ हो गया तो बच्चों का क्या होगा, मेरा क्या क्या होगा? पर वो हर बार
हँसकर कह देते, “अरे मुझे कुछ नहीं होगा इतना हट्टा-कट्टा तो हूँ| तुम नाहक चिंता
करती हो|” अब तू ही बता सविता, बीमारी क्या उम्र देख कार आती है, टेलीफोन करके
पूर्व सूचना देती है क्या? कि कोरियर भेजती है कि मेल भेजती है? मैंने उन्हें बहुत
कहा कि ऐसा कब चाहती हूँ कि तुम्हें कुछ हो|
पर जिंदगी का कोई ठीक है क्या? अच्छा
भला आदमी अपनी गाड़ी से चला जा रहा है और सड़क दुर्घटना में खत्म| लेकिन उनका जवाब
होता, “मैं बहुत संभल कार अपनी मोटर-साईकिल चलता हूँ|”
अरे भाई तुम संभल कार चलाते
हो पर दूसरा भी तो संभल कार चलाये| तू भी तो देखती है न सविता, रोज़ रोज़ कितनी
दुर्घटनाएं होती हैं, बसों से, मोटरों से, रेलगाड़ियों से, और कितने लोग घटनास्थल
पर ही दम तोड़ देते हैं| पर योगेश को न मेरी बात सुननी थी, न सुनी| जो बीमा करा
लिया होता तो आज...”
“अब जो होना था वो
हो गया| आगे की सोच| अभी तो खाना खा| बच्चे भी भूखे होंगे|”
“सविता की बात
अनसुनी कर दीपा ने फिर कहा, “होनी को तो खैर, कोई नहीं टाल सकता| अब देखो न, रोज़
दफ़्तर से सीधे घर आते थे| उस दिन जाने क्या सूझी कि बाज़ार चले गए| ब्लास्ट भी तभी
होना था और..” दीपा हीर फफक फफक कार रो पड़ी| “ न बीमा कराया, न वसीहत लिखी| अब हम
क्या करेंगे, कहाँ जायेंगे? आँसू पोछते हुए दीपा ने कहा|
सविता दीपा को शांत
कार घर आ गई पर खुद बहुत अशांत हो गई| दीपा की हालत ने उसे अपने विषय में सोचने पर
मजबूर कार दिया| बीमा तो कम से कम हमें भी करा लेना चाहिए| जो आज दीपा के साथ हुआ,
कल किसी के भी साथ हो सकता है| चार-छः दिन बड़ी व्याकुल रही सविता| फिर एक दिन अपने
पति आशुतोष से कहा- ”देखो तुम्हारा इतना बड़ा बिज़नेस है वो भी पार्टनरशिप में| कभी
कभी पार्टनर ऐसा डिच करते हैं कि पूछो मत|”
“ श्रीकांत के विषय
में ऐसा खयाल भी मन में मत लाना| वो मेरा बचपन का दोस्त है|”
“श्रीकांत कि बात
नहीं कार रही| लेकिन कभी कभी सगे भाई भी धोखा दे देते हैं, दोस्त कि कौन कहे|”
आशुतोष ने कुछ सुना
कुछ नहीं पर सविता धाराप्रवाह बोलती गई, “वो मेरी सहेली रमा है न! उसके पिताजी कि
भी पार्टनरशिप में एक्सपोर्ट का धंधा था| काम के सिलसिले में लुधीयाना गए थे| वहीं
हार्ट-अटैक हुआ और बस! बवी बच्चे वहाँ भागे और यहाँ मित्रमहोदय ने रातों-रात सारा
माल खिसका लिया| जब लौटे तो दुकान खाली| हिसाब-किताब भी उल्टा-सीधा समझा दिया कि
धंधा तो घाटे में चल रहा था| रो पीटकर रह गए बेचेरे|”
आशुतोष कि नज़रें
अखबार में गड़ी थीं| अखबार सविता के हाथ में भी था पर वो बोले जा रही थी| “अब
सुप्रिया कि सुनो| उसके बड़े भैया, जी तोड़ मेहनत करके पैसा बैंक में जमा करते थे| बाहर
का काट भिया देखते, रुपया पैसा उनके दोस्त सँभालते| मौका देखकर जौइंट अकाउंट का
फायदा उठा उन जिगरी दोस्त ने सारा पैसा हड़प लिया| ऐसा सदमा लगा सुप्रिया के भैया
को कि एक रात सोये तो सुबह उठे नहीं|
“तुम कहना क्या
चाहती हो?” आशुतोष थोड़ा तैश मं आकार बोला|
“देखो, नाराज़ न हो,
आशु! थोड़ा ठन्डे दिमाग से सोचो, मकान तुम्हारे नाम है, बिज़नेस तुम्हारा है,
अगर...”
“अगर मुझे कुछ हो भी
गया तो सारा कुछ तुम्हारा ही होगा”
सविता कि बातों से
बेचैन और अधीर होते हुए आशुतोष ने कहा|
“सो तो मैं भी कमाती
हूँ, आशु| अच्छा खासा बैंक बैलेंस मेरा भी है| पापा का दिया पैसा भी है और ज़ेवर भी
मेरे पास बहुत हैं| मैं तो... मेरा मतलब वो नहीं है जो तुम समझ रहे हो| मैं ये
कहना चाहती हूँ कि हम दोनों स्कूटर पर जाते हैं, जो दोनों ही एक साथ चल बसे तो...”
“तो? तो क्या?”
आशुतोष झल्ला उठा|
हमें अपना जीवन बीमा
करा लेना चाहिए, आशु| नहीं तो...”
“तो जो होगा देखा
जायेगा|” लापरवाही से कहा आशु ने|
“क्या देखा जायेगा?”
सविता उत्तेजित हो उठी| “कोई रिश्तेदार, कोई ऐरा-गैरा आकार हक जमा लेगा और क्या?”
“कौन है ऐसा?”
“कोई भी हो सकता है|
पापा के दोस्त रामकुमार का नाम सुना होगा| करोड़ों की मिल्कियत थी| जितने ज़मीन
जायजाद के धनि, उतने ही दिल के भी ढकनी थे| किसी की बेटी का ब्याह है, किसी का घर
ढह गया, किसी की नौकरी छोट गई, कोई बीमार है, किसी को कहीं ज़रूरी काम से जाना है,
हर एक को हर तरह से मदद करने वाले| वो तो देना ही देना जानते थे| पर जब अचानक चल
बसे तो बीसियों लोग आकार खड़े हो गए| रामकुमार जे ने हमसे इतने र्रुपए उधार ल्लिये
थे, हमारे उनके ऊपर इतने रूपए बकाया हैं, हमारे इतने रूपए उनके पास जमा थे| बेटा
सबकी सुनता रहा, सबका उधार पत्ता रहा| कौन झगड़ा मोल ले, दुश्मनी करे|”
सविता थोड़ा रुकी,
आशुतोष के चेहरे के हाव-भाव पड़ने की कोशिश की, और फिर उसी लहज़े में कहने कगी, “एक
दूसरे दोस्त भी थे पापा के, नागेन्द्रनाथ| उनकी एक उपपत्नी भी थी और उससे एक बेटा|
उनके रहने के लिए सुंदर सा दो मंजिला मकान बंगाली मार्केट में बनवा दिया था|
नागेन्द्र अंकल ब्याहता पत्नी और बेटा-बेटी के संग कभी सुंदरनगर में रहते कभी
बंगाली मार्केट में| अंकल के न रहने पर बड़े बेटे ने बंगाली मार्केट वाले घर पर
अपना हक जमाया| विमाती ही सही, थी तो माँ| सौतेला ही सही, था तो भाई| दोनों खाब
रोये, गिडगिडाये पर बेटा राम का दिल न पसीजा| शादीशुदा बीवी तो थी नहीं जो जो
कोर्ट कचहरी करती| न घर अपना रहा, न रुपया पैसा ही साथ लगा| अंकल ने घर अपने नाम न
बनवाकर आंटी के नाम बनवाया होता तो झगड़े की कोई बात ही नहीं थी|”
आशुतोष सुनता रहा,
बोला कुछ नहीं| सविता भी कब तक बोलती सो चुपचाप जाकर रसोई में काम करने लगी| लेकिन
खाना खाते समय उसने फिर बात छेड़ डी|
“हमारी बुआ की बेटी
है ना चित्र| ठाट से रहती थी| पता नहीं क्यों, जीजाजी का किसी ने क़त्ल कार दिया| चित्र
दीदी के पास उनके क्रिया-कर्म तक का इंतजाम नहीं| कभी दीदी से बाताया नहीं कि किसी
बैंक में खता है, कितना पैसा है| दीदी ने कभी जानना भी चाहा तो जीजाजी ने कहा तुम
अपना घर देखो, बाहर का काम मेरा| गाँव में ज़मीन थी, पुश्तैनी मकान था| पिछले साल
वो बेचा था, ये तो दीदी जानती थीं, पर रुपया कहाँ रखा, क्या किया, किसको दिया यह
सब उन्हें कुछ नहीं मालूम| छोटे-छोटे बच्चे, सीधी-सधी लड़की, ऐसी कठिनाई में पड़ी कि
क्या बतायें| आदमी को कुछ तो बीवी बच्चों के लिए सोचना चाहिए|”
आशुतोष ने कुछ कहा,
न कुछ टिप्पड़ी दी| बस सुनता रहा| खाना खाकर थोड़ी देर बच्चों से बातें कीं, थोड़ा
टी.वी. देखा और सोने चला गया| सविता भी काम से निबट कर चुपचाप बिस्तर पर लेट गई|
बोली कुछ नहीं, बस करवट बदलती रही|
आशुतोष थोड़ी देर
गुमसुम रहा| फिर सविता के सिर पर हाथ फेरते हुए बोला, “आज-कल तुम बहुत नेगेटिव
थिंकिंग करती हो| इतना टेंशन मत लो, तबियत खराब हो जायगी|” आवेश में कोई हो तो
प्यार व हमदर्दी के शब्दों से या तो गुस्से का विस्फोट हो जाता है या आवेश पिघल
कार आँसुओं का सैलाना बन उमड़ पड़ता है| सविता आशुतोष की छाती से चिपट गई औ फूट-फूट
कार रोने लगी|
आवेग थोड़ा कम हुआ तो उठकर बैठ गई और सुबकते हुए बोली, “मैं तो अपने
चारों तरफ़ देख सुनकर ही परेशान हूँ, वो भी अपने लिए नहीं, बच्चों के लिए| दीपा की
हालत मुझसे देखी नहीं जाती| तुम देख कार भी कुछ नहीं देखते, दूसरों के अनुभव से
सबक नहीं लेते| मैं तो सिर्फ इतना चाहती हूँ कि हमारे पीछे बच्चों को कोई परेशानी
न हो| आंटी के जैसी, दीपा और चित्र के जैसी डांवाडोल स्थिति न हो|
“तो क्या किया जाय?”
आशुतोष भी उठकर बैठ गया|
“मेरा कहा तुम
मानोगे जो मैं कुछ समझाऊँ|”
“ऐसी बात नहीं,
सविता| हमेशा तुम्हार कहा मन है| तुम्हारे बिना मेरा काम चलता है क्या? तुम्हें नाराज्के
मैं कहाँ रहूँगा?” बड़ी आद्र वाणी में, बड़े लड़ से कहा आशुतोष ने| “बताओ, क्या करना
चाहिए हमे?”
“जीवन बीमा तो करना
ही चाहिए, हम दोनों को भी अपनी वहीहत लिखनी चाहिए|” बड़ी गंभीरता के साथ सविता
बोली|
“वसीहत? हमें?” ज़ोर
से हंस पद आशुतोष| “अभी तो बीमा कि बात कार रहीं थी अब... वसीहत लिखने कि उम्र है
हमारी-तुम्हारी?” वो ज़ोर ज़ोर से हंसने लगा|
“क्यों, क्या विधान
में लिखा है, क्या कोई कानून है कि वसीहत इस उम्र में नहीं लिखी जा सकता, या पंडित
ने कहा है कि इस उम्र में वसीहत कि बात नहीं करनी चाहिए?” सविता फिर आवेश में आ
गई|
“अरे, मैं तो यों ही
कह रहा था| अच्छा बताओ, क्या लिखेंगे हम लोग?”
“ लिखेंगे मेरा सिर
और तुम्हारा सिर---“ सविता के आँसू फिर झलक आए|
“ लो तुम तो नाराज़
हो गई| ज़रा प्यार से ओलो, थोड़ा अच्छे से समझाओ| मुझे ये सब कुछ नहीं आता| मैंने
कभी इस तरह सोचा भी नहीं| सच कह रहा हूँ, सविता|”
“खुद समझ नहीं आता
तो दूसरे कि समझ से काम लो| लेकिन अहं के आगे आदमी किसी को कुछ समझता ही नहीं|
“सही कह रही हो|
अच्छा अब बताओ”- आशुतोष समझौते के मूड में था| सविता थोड़ी देर चुप रही| फिर आँसू
पोछे, गला साफ़ किया और बोली, “बड़े चच्जी को गुज़रे कितने साल हुए?”
“यही कोई चार साल|”
“चाचाजी तो अच्छी
हैसियत वाले थे||
“हाँ! बहुत बड़ा अपना
निजी मकान, अच्छा खासा बैंक बैलेंस और चची के बहुत सारे ज़ेवर|”
“तो उस सबका क्या
किया चाचाजी ने?”
“ज़ेवर तो चाची जी ने
अपने जीवन काल में ही बहू-बेटियों को बाँट दिए थे| मकान के लिए बचाचा ने वसीहत कि
थी कि जब तक वो हैं, घर उनका रहेगा| बाद में नीचे का हिस्सा छोटे बेटे का, ऊपर का
बड़े बेटे का| छत दोनों की| बैंक में जो फिक्स डिपाज़िट थे वो आधा आधा दोनों बेटियों
का| पेंशन आदि का जो पैसा सेविंग्ज़ अकाउंट में था वो बराबर बराबर नाती पोते का|
‘चाचा जी के बाद
बच्चों में कोई झगड़ा फसाद हुआ?’
‘बिल्कुल नहीं| सब
आराम से रह रहे हैं, मिलजुलकर, प्यार के साथ| पास के पास, दूर के दूर|’
‘किसी बाहर वाले ने
भी कोई छीन झापड़ नहीं की?’
‘नहीं| जब चाचाजी ने
वसीयत लिख दी तो कोई क्या कहेगा?’
‘मेरे पापा ने भी
वसीयत कर दी थी और जिसको जो मिलना था, मिल गया| पर जिन्होंने वसीयत नहीं की उनका
हाल भी सुन लो| पापा के एक दोस्तों और अपनी बहिन चित्रा के विषय में पहले ही बता
चुकी हूँ| एक और मिसाल है मम्मी की मौसेरी बहिन की| मौसाजी बहुत पहले गुज़र गए थे|
संतान कोई भी नहीं, ज़मीन जायदाद खूब| उसका निबटारा मौसा जी खुद कर गए थे| मौसी खूब
दबंग, खूब सक्रिय| अकेली बड़े भारी बंगले में रहतीं| पहले कोई परेशानी नहीं हुयी,
जब निढाल होने लगीं तो उनके मन में तरह तरह के ख्याल आने लगे| सोचा, ज़िन्दगी और
मौत के बीच साँसों का जो पुल है, पता नहीं कब ध्वस्त हो जाय| बंगले का और रुपयों
पैसों का कोई तो इंतजाम करना चाहिए| मौसी सोचती रहती क्या इस घर को ओल्ड ऐज होम
बनवा दूं, क्या किसी अनाथालय को दान कर दूं, कोई ट्रस्ट बना दूं? पर कहीं भी चित्त
स्थिर न हो पाया| कानूनी दृष्टि से मौसी के घर व धन संपत्ति के हकदार उनके इकलौते
देवर थे लेकिन ‘अंतिम इच्छा’ के रूप में मौसी ने घर देवर के बेटे सुलभ के नाम लिख
दिया|’
कहानी में बड़ा रोचक
सा मोड़ आनेवाला थी लेकिन सविता को लगा आशुतोष रूचि नहीं ले रहा है| उसे झकझोर कर
पूछा सविता ने ‘सुन रहे हो न?’
‘हाँ हाँ फिर क्या
हुआ?’
‘हुआ ये कि मौसीजी
का दूर का भतीजा करण उन्हीं दिनों अपने निजी काम से इलाहाबाद आया था| दो चार दिन
मौसी के साथ रहकर उसने उनकी मजबूरी ताड़ ली| उनसे खूब चिकनी चुपड़ी बातें की, खूब
हमदर्दी जताई, खूब हाथ पाँव दबाये और मौसी का मन मोह लिया| एक दिन आँखों में आंसू
भर कर कहा ‘आपकी हालत देखि नहीं जाती, बुआ| यह उम्र और घर का इतना काम! इस समय तो
आपकी देखभाल व सेवा होनी चाहिए’
‘अरे, कौन बैठा है
रे, मेरी सेवा करने के लिए’
‘ऐसा क्यों सोचती
हैं आप? मैं हूँ न! मुझे क्या, जो काम नैना में रहकर करता हूँ वो यहाँ से भी कर
सकता हूँ| वक्त ज़रुरत के लिए कोई तो पास में हो|’ मौसी गदगद, और भतीजे राम ने घर
में डेरा जमा लिया| इसी तरह एक दिन मौसी को मतिभ्रम करके परिवार को भी बुला लिया|
‘इतना बड़ा घर, सूना सूना लगता है, बच्चों से रौनक हो जायेगी| पुष्पा आपकी खूब सेवा
करेगी|’ अंधा क्या मांगे, दो आँखें| बुढ़ापे का सहारा तो चाहिए ही था, सो आ गई’
बातों में और करण के बीवी बच्चों मौसी के घर में आ बसे| वाकई पुष्पा मौसी को पाँव
ज़मीन पर न रखने देती| उनके मन का खाना बनाती, प्यार से खिलाती, समय से दबा देती,
सर में तेल मालिश करती और रात में रोज़ पाँव दबाती| मौसी तो बाग बाग| एक दिन पुष्पा
ने कहा ‘सास ससुर के दर्शन मुझे हुए नहीं| धन्यभाग मेरे, कि आपकी सेवा करने का
अवसर मिला|’ मौसी ने प्यार के साथ अपना वरदहस्त पुष्पा के सर पर रख दिया| अब तो
पुष्पा मौसी के पैरों से लिपट गई|
‘ये चरण ज़िन्दगी भर
न छोडूंगी बुआ, आखिरी दम तक नहीं|’
मौसी का दिल पसीज
उठा| सोचने लगीं कहाँ का देवर, कहाँ की देवरानी| बुलाये बुलाये आते नहीं, झाँकते नहीं,
पूछते तक नहीं| और सुलभ का क्या ठीक| बाहर पढ़ने गया है, कहो लौटे, कहो वहीँ बस
जाय| जो आखिरी वक्त में साथ दे, जो सेवा टहल करे वही अपना| और भतीजे व बहू के
आश्वासन से मौसी ने अपनी अंतिम इच्छा, अपनी वसीयत बदल दी| जाने कैसे देवर्जी को
मनक पड़ गई| भागे भागे आए मियाँ बीवी| भतीजे राम को खूब खरी खोटी सुनाई और जैसे
तैसे उसे घर से खदेड़ा|’ कहानी खत्म हुई तो सविता लेट गई| आशुतोष भी लेट गया और
बोला ‘किसी की वसीयत बदलवाना बड़ी हिम्मत का और जोखिम का काम है|’ ‘आगे की भी तो
सुनो’ सविता को जैसे कुछ याद आ गया|
पिछले साल जब मौसीजी का देहान्त हुआ तो उनकी
नौकरानी मौसी के दस्तखत किये पपेरों के साथ सामने आ गई| ‘घर तो मालकिन ने मेरे नाम
लिख दिया था, ये देखो|’ मालूम नहीं पेपर जाली थे या मौसी से गलती हो गई थी पर देवर
जी ने बड़ी मुश्किल से ले देकर मामला रफा दफा किया|
आशुतोष थोडा अलसा
रहा था| उवासियाँ लेने लगा| उस पर कोई प्रतिक्रिया न दिखी तो सविता फिर बौखला गई|
‘इतनी बड़ी बात बता रही हूँ और तुम पर कोई असर नहीं| घर की बात है न, तो छोटी और
मामूली लगती है| बाहर देखो बड़े बड़े लोगों के साथ क्या क्या हो रहा है|’ आशुतोष ने
जिज्ञासा के साथ सविता की ओर देखा, बोला कुछ नहीं|
बोली सविता- ‘अख़बार तुम पढ़ते हो
खबरें मुझे ज़्यादा पता रहती हैं| दुनिया जानती है कि धीरुभाई अम्बानी की 75,600
करोड़ की संपत्ति थी| उन्होंने कोई लिखित वसीयत नहीं छोड़ी| अब देखो दोनों बेटों
मुकेश और अनिल में प्रापर्टी के पीछे कैसे छीना झपटी हो रही है| मानहानि का दावा
करने तक से नहीं चूकते| प्रियम्बदा बिड़ला किसी वजह से बेटों से नाराज़ हो गयी और
साड़ी सम्पत्ति अपने निजी सचिव लोढा के नाम पर कर दी| बिड़ला बन्धु वसीयत को जाली
बताकर 2004 से कोर्ट के दरवाज़े खटखटा रहे हैं|
और जानते हो, प्रवीन बाबी इतनी बड़ी
सिने कलाकार थीं पर अकलदो कौड़ी की नहीं| परिवार से कट कर रहीं, अकेली रहीं, कष्ट
में रहीं| दौलत छोड़ी चार करोड़ की, पर किसके नाम? किसी के नहीं| अब जाने कहाँ कहाँ
से उनके तथा कथित रिश्तेदार अपने अपने दावे ठोक रहे हैं| मफतलाल और सिंधिया
परिवारों में भी ऐसा ही कुछ हुआ था|
ये तो खैर ऐश्वर्यशाली परिवार ठहरे| सौ बात की
एक बात ये कि आदमी छोटी हैसियत का हो या बड़ी, उसे जीवन बीमा करा लेना चाहिए और
अपनी वसीयत तो ज़रूर लिख देनी चाहिए ताकि बाद में न ऐसी परिस्थिति आए कि बच्चे सड़क
पर, न ये कि लड़ें झगड़ें, और कोर्ट कचेहरी करते फिरें, बल्कि प्यार से मिल जुलकर
रहें और प्रेम व श्रद्धा के साथ माता पिता को याद करें|
आशुतोष ने सविता का
सिर सहलाया और मुग्ध भाव से कहा ‘तुम्हे तो वकील होना चाहिए था सविता|’
‘अब चिढायो मत मुझे’
सविता ने रूठते हुए स्वर में कहा|
‘मैं सच कह रहा हूँ|
ऐसे तर्क पेश करती हो कि आदमी सही को गलत और गलत को सही मान ही ले|’
‘क्या मतलब? जो कुछ
मैंने कहा सब गलत है?’
‘न बाबा न! मतलब यह
कि तुम्हारी बात एक सौ एक प्रतिशत सच| मैं कल ही इस बारे में पूछताछ करता हूँ|’
‘अभी ऐसा कह रहे हो,
सुबह तक सब भूल जाओगे|’
‘अब तो भूलने का कोई
कारण नहीं|’
‘प्रामिस?’
“हाँ प्रामिस|’
सविता मुस्कुरा दी|
प्यार से आशुतोष को गले लगाया, माथा चूमा और करवट बदल कर कहा ‘अच्छा अब सो जाओ’ और
स्वयं सोने का अपकर्म करने लगी| उसे संतोष था कि आशुतोष को वह सही समय पर, सही
दिशा में, सही कदम उठाने के लिए प्रेरित कर सकी|