Sunday, 10 June 2012

यात्रा




जम्मूतवी ट्रेन जैसे ही प्लेटफोर्म पर पहुंची, समीर के भाई-भाभी, दोनों बहेनें भावना और कामना तथा भतीजी आरुषि स्लीपर कोच नंबर १७०४ की ओर भागे | गाड़ी दो घंटे देर से पहुँची थी अतः ये लोग बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे थे | और क्यों ना करते? तीन साल बाद सुलेखा और समीर घर लौट रहे थे | गए तो दो थे, किन्तु वापिस आ रहे थे तीन| इसी लिए सब के सब समीर और सुलेखा की अपेक्षा छोटे बच्चे सजल को देखने के लिए अधिक उत्सुक थे | आठ महीने के सजल को लेकर सुलेखा जैसे ही ट्रेन से उतरी, भावना ने झपट कर उसे गोद में ले लिया और चूम कर पुचकारने लगी | कामना और आरुशी भी बारी-बारी उसे गोद में लेकर उछाल-उछाल कर खिलाने लगीं | भाई-भाभी सामान उतारने में और कुली तय करने में समीर की मदद कर रहे थे | जैसे तैसे सब घर पहुंचे और अब बालक का पूर्ण निरीक्षण कर सब अपना अपना विचार प्रकट करने लगे| दादी माँ ने सजल को गोद में लेते हुए कहा, “आ बेटा! बड़ा इन्तज़ार कराया तूने|” फिर स्निग्ध भाव से बोलीं, “प्यारा बच्चा है | छोटे में समीर भी तो ऐसा ही गोल-मटोल और सुंदर था | ” दादी माँ की गोद से अब सजल अपनी पर-दादी अर्थात समीर की दादी की गोद में था| प्यार से निहारते हुए वे बोलीं, “इसका माथा और होंठ समीर जैसे हैं पर आँखें भाभी की तरह हैं बड़ी बड़ी |” कामना की राय थी, “पैर के पंजे भी तोह चाची जैसे हैं” तोतली सी वाणी में आरुशी ने कहा| “ अपने समीर और सुलेखा सांवले सलोने और बच्चा ऐसा गोरा चिट्टा |” दादी ने कहा तो उनके जवाब में दादाजी बोले, “अरे आबहवा का असर पड़ता है कि नहीं? काश्मीर में तो सभी गोरे, खूबसूरत होते हैं |” इस बीच चाय नाश्ते का दौर चलता रहा, सामान यथास्थान रखना जारी रहा और सजल को लेकर तरह-तरह की टीकटिप्पणी भी होती रही | समीर की दादी कुछ अधिक ही आहलादित थीं | नाश्ते के पश्चात अपनी रोज़ की दवा खाते हुए बोलीं, “कश्मीर प्रवास समीर और सुलेखा के लिए और हम सबके लिए भी बड़ा ही भाग्यशाली रहा | यहाँ तो हम पाँच साल तक सुलेखा का इलाज कराते रहे, पूजापाठ कराते रहे, मन्नतें मांगते रहे | जिसने जो बताया वाही करते रहे | दोनों की डॉक्टरी जाँच भी हो गयी थी और डॉक्टर के सुझाव से बेचारी का ऑपरेशन भी करवा दिया | पर इसकी ना कोख हरी होनी थी, ना गोद भरनी थी | “श्रेय तो कश्मीर को मिलना था ना”, प्रसन्नमुख भाभी ने सुलेखा को छाती से लगाते हुए कहा| फिर बोलीं, “सच-मुच वहाँ की आबहवा में बड़ा दम है | खिला या पिलाया भी अच्छा समीर ने | तभी ना सजल इतना स्वस्थ और इतना प्यारा है | सजल भाभी की गोद में था और कामना, भावना तथा घर के नौकर-चाकर सब उन्हें घेर खड़े थे | टकटकी बांधे सजल को निहार रहे थे | कहीं नज़र ना लग जाए सो दादी माँ ने झट से ‘राई-नोन’ लेकर बच्चे की नज़र उतार दी | माथे पर दायीं ओर काला डिठोना भी लगा दिया | और दोनों हाथों से बलैयाँ ले उँगलियाँ कनपटी से लगा कर चटका दीं |

समीर का तबादला श्रीनगर से मद्रास हो गया था | छै हफ्ते का जॉइनिंग टाइम मिला था | घर में छोटा बच्चा हो और सर्दियों का मौसम, तो दिन कब निकलता है, कब ढल जाता है, पता नहीं चलता | खाते-पीते, मिलते-जुलते, खेलते-खिलाते, छै हफ्ते झट से बीत गये | सुलेखा और समीर सामान पैक करने में लग गए | कुछ सोचते-विचारते एक दिन दादीजी बोलीं, “जो थोड़े समय के लिए ये लोग कश्मीर ही रह जाते तो कितना अच्छा होता |” भाभी दादीजी का मंतव्य भांप गईं| खिलखिलाते हुए बोलीं, “कोई बात नहीं दादीजी, मद्रास से सजल के लिए श्यामली सुंदरी बहिन लाएगी सुलेखा | हैं ना सुलेखा?” सुलेखा शर्मा गयी|

नियत तिथि पर समीर और सुलेखा मद्रास के लिए रवाना हो गए | सुलेखा की गोद में सुंदर, स्वस्थ और चंचल सा बच्चा सहयात्रियों का ध्यान आकर्षित कर रहा था | सुलेखा कभी उसे बिस्कुट देती, कभी झुनझुना पकड़ाती, कभी गोद में लिटा कर थपकियाँ दे सुलाने की कोशिश करती | पर ट्रेन के कम्पार्टमेंट का वातावरण सजल को रास नहीं आ रहा था और वह मचल कर रोने लगा तो समीर ने गोद में ले लिया और तरह-तरह की भाव भंगिमायें बना कर उसे बहलाने लगा | फिर भी कुछ ना हुआ तो, कम्पार्टमेंट में घूमने लगा | सुलेखा बर्थ पर पैर पसार कर लेट गई | तड़के उठी थी, कल सारा दिन तैयारी में व्यस्त थी, अतः थकान के कारण थोड़ा सोना चाहती थी पर चलती गाड़ी के हिचकोले और शोर-शराबा नींद में व्यवधान बन रहे थे | आँखें बंध थीं, गाड़ी दक्षिण की ओर भाग रही थी पर सुलेखा का मन विपरीत दिशा में दौड़ने लगा|

आज से तीन साल पहले भी वह ट्रेन में बैठी कश्मीर जा रही थी | डिब्बे में तमाम से सहयात्री थे पुरुष भी, महिलाएं भी और छोटे बच्चे भी| सामने वाली बर्थ पर  एक महिला नन्हे शिशु को कभी बोतल से दूध पिलाती, कभी उसकी नेपी बदलती, कभी बाँहों में झुलाती और कभी गुनगुना-गुनगुना कर थपक थपक कर बच्चे को सुलाने की कोशिश करती | सुलेखा का मन होता वो कहे दीदी, बच्चे को दूध मैं पिला दूं, नेपि मैं बदल दूं! लाओ दीदी, बच्चे को मैं सुला दूं! उसे लगता था कि वो बच्चे को खूब दुलराए, बेबीटाक करे पर कैसे? अगर सामने वाली माँ को मालूम हुआ कि वह बाँझ है, निपूती है, तो शायद उसकी छाया से भी परहेज करे| अतः मन मारे बैठी रही | बगल वाली महिला की बेटी चंचल थी | बार बार आकर सुलेखा की साडी खीचती, उसकी बर्थ पर चढ़ने की कोशिश करती, किन्तु सुलेखा ने संकोचवश उसे छुआ तक नहीं| वैसे संकोच काहे का | जो किसी ने पूछा, तो कह देगी उसके दो बच्चे हैं | दादी के पास छोड़े हैं | नई नौकरी नई जगह, वो भी ठंडी बर्फीली, बच्चों के लिए ठीक नहीं | फिर सोचा क्यों बोले झूठ, किसलिए बोले झूठ! जो है, सो है | फिर भी सुलेखा को यह स्वीकार नहीं था कि उसे निस्संतान जान कर कोई उस पर तरस खाए या तिरस्कार से उसे देखे या अपने बच्चों को उससे अलग रखे जैसा कि एक-दो बार उसके साथ हो चुका था| चाहे ऐसा हुआ हो अनजाने में ही, पर सुलेखा को ऐसा ही लगता था | अब वो नई जगह जा रही है | वहाँ भी उसे अवहेलना के साथ देखा जायेगा, उसके स्त्रीजीवन की सार्थकता में कमी समझी जायेगी | मात्रिपद नहीं मिला तो, उसका नारी जीवन व्यर्थ अथवा अधूरा माना जायेगा | वहां भी सब महिलाएं अपने बच्चों को उससे परे रखेंगी| सोच-सोच कर सुलेखा का सिर चकराने लगा था, आँसू बहने लगे थे | सोचते-सोचते सुलेखा के अब भी आँसू निकल पड़े पर इसी बीच वो चंचल बच्ची सूटकेस से टकरा कर गिर पड़ी और चीख-चीख कर रोने लगी थी | उसकी चीखें सुन कर सुलेखा आपे में आ गई | माँ आसपास दिखी नहीं| झट से बच्ची को गोद में उठाया, उसकी चोंट पर फूँक मारी, और कुछ नहीं हुआ-कुछनहीं हुआ कहकर बच्ची को छाती से चिपटा लिया | बच्ची धीरे धीरे चुप हो गई और सुलेखा को बहुत अच्छा लगा| माँ आई तो बच्ची लपक कर माँ की गोद में चली गई, फिर अपनी दुनिया में, कल्पना की दुनिया में लौट गई |
                 
   समीर सुलेखा का दर्द समझता था, उसकी व्यथा को दूर करने के लिए कुछ भी कर सकता था, कुछ भी | पर वो करे तो क्या करे? एक दिन उसने समझाना चाहा, “अपने मन को इस तरह त्रास नहीं दो, लेखा! अपने पास सब कुछ है, बच्चा ही तो नहीं है! सो तुम मुझे अपना बच्चा समझ लो, मैं तुम्हे अपना बच्चा मान लूंगा!” बड़े प्यार के साथ समीर ने उसे राहत देना चाही थी | पर सुलेखा ने लपाक से जवाब दिया, “ऐसे समझने और मानने से क्या होता है?” और फूट-फूट कर रोने लगी थी | सुलेखा के दुःख से दुखी होकर उसने फिर एक सुझाव दिया, “क्यों ना हम एक बच्चा गोद ले लें |”
“नहीं!”, सुलेखा ने कह | “दूसरे के बच्चे के साथ हम कितने ईमानदार रह सकेंगे, उसे कितना अपना समझ सकेंगे | और वह भी बड़ा होकर हमें कितना अपनाएगा? अच्छा निकला तो ठीक, ढंग का ना निकला तो कहा जाएगा कि अपना होता तो मन से पाला होता | ना, बाबा ना | मुझे नहीं चाहिए बच्चा-वच्चा | यह झंझट मैं नहीं पाल सकती |” पर सुलेखा दुखी तो थी और दुःख की छाया उसके चेहरे पर स्थायी रूप से बनी रहती |

समीर सोचता था, कश्मीर पहुँच कर सुलेखा का मन बदल जाएगा | यहाँ की हरी-भरी वादियों में दोनों घूमेंगे, झीलों पर मोटर बोट से सैर करेंगे और खूब खुश रहेंगे | पर सुलेखा उदास रहने के साथ-साथ अब खीजी-खीजी भी रहने लगी थी | बात-बात पर बेवजह झल्लाती रहती और हीन-भावना से ग्रस्त रहती | स्त्रियों की अपेक्षा आम तौर पर पुरुष अधिक व्यवहारिक व शीघ्र निर्णय लेने वाले होते हैं | सुलेखा किसी मानसिक रोग से ग्रस्त हो, इससे पहले ही कोई ना कोई कदम तो उठाना ही होगा | समीर इसी उधेड़ बुन में उलझा रहता|

गाड़ी किसी स्टेशन पर रुकी थी | स्टेशन छोटा हो या बड़ा, वही भागम-भाग, वही धक्कमपेल, खोमचों वालों की आवाजें और वही भिखारियों का गिडगिडाना | समीर नीचे उतर कर दो ग्लास चाय और समोसे ले आया | दोनों ने आराम से चाय पी| बच्चे को सुलेखा ने बर्थ पर सुला दिया था | समीर भी आराम करने ऊपर की बर्थ पर चला गया | सुलेखा कभी सोये हुए सजल की विभिन्न मुद्राएं देखती, कभी खिडकी से बाहर के दृश्यों को आँखों में भरती, कभी सहयात्रियों के आपसी वार्तालाप का आनंद लेती | धीरे धीरे वह फिर अतीत में पहुँच गई |

वह सकपका गई थी जब समीर ने उससे किचिंत आक्रोश में कहा था, “या तो दिन-रात इसी तरह बिसूरते रहो, या परिस्थिति को अपना प्रारब्ध मान स्वीकार कर लो और हँसी-खुखी जिंदगी बिताओ, या फिर परिस्थिति बदलने का उपाय करो |” क्या उपाय करे, वह सोच रही थी कि समीर ने कहा, “देखो लेखा, आजकल विज्ञान के बहुत तरक्की कर ली है, हमें भी भावुकता छोड़ कर वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिये |” सुलेखा टकटकी बांधे उसे देखती रही और सुनती रही |

“जो दम्पत्ति किसी कारणवश संतान बिना रह जाते हैं, तो ऐसे उपाय हैं कि वे भी माता-पिता बन सकें |” सुलेखा बोली कुछ नहीं पर आँखों में प्रश्न थे कैसे? किस तरह? समीर ने कहा, “विदेशों में तो आम बात है | अपने यहाँ अभी चलन कम है | फिर भी प्रयोग यहाँ भी हो रहें हैं और खूब हो रहे हैं|

“कैसे बन सकते हैं माता-पिता? “ सुलेखा का प्रश्न था |

“ किसी की कोख उधार पर लेकर, या किराये पर लेकर | कितने ही दम्पत्ति इस प्रकिया द्वारा माता-पिता बन संतान सुख भोग रहे हैं |”

“यह कैसे हो सकता है?”

“हो सकता है और हो रहा है | असल में तुम अखबार-वगैरह ज्यादा पढ़ती नहीं, तो तुम्हें इन बातों की जानकारी कम है |”

“ लेकिन ये भी दूसरे का बच्चा हुआ ना! एक तरह से गोद लिया हुआ |”

“ हाँ! पर वह बच्चा पचास-तिशत तो अपना होगा | जन्मदात्री कोई और होगी, पर माँ तो तुम ही रहोगी और पिता मैं”, समीर ने थोड़ा झिझकते हुए कहा |

“ यह तो अनैतिकता होगी | रहने दो, अबसे मैं कभी बच्चे की चर्चा नहीं करूंगी, न उसके विषय में मैं सोचूंगी” थोड़ा तैश में बोली सुलेखा |
   
“ इसमें अनैतिकता जैसी कोई बात नहीं, जो कुछ करना है, डॉक्टरों को करना है, मुझे नहीं | ज़रा समझने की कोशिश करो लेखा!”

सुलेखा सोच विचार में पड़ गई थी | ना खुश हो पा रही थी, ना स्वीकार कर पा रही थी | माँ बनने की साघ इतनी बलवती थी कि इनकार भी नहीं कर पा रही थी | उसने शंका व्यक्त की, “घर में मालूम होगा तो सब क्या कहेंगे? 

“ कहेंगे तो, तब जब मालूम होगा | वहाँ कौन खबर करने जाएगा? और मालूम हो तो हो, बल्कि हमे खुद बता देना चाहिए| कोई चोरी तो है नहीं, डाका तो डाल नहीं रहे |”

लेखा का मन फिर भी सौ-प्रतिशत हामी नहीं भर रहा था | उसने समीर से कहा “दूसरे के बच्चे के लिए कोई महिला नौ-दस महीने के लिए कष्ट भोगने और ज़िम्मेदारी उठाने के लिए क्यों तैयार होगी?”

“ किसी का बच्चा अपनी कोख में रखना आसान काम नहीं है पर कई महिलायें खुशी-खुशी यह काम करती हैं | सेरोगट मदर कहते हैं उन्हें | सेरोगेट मदर और सेरोगेसी प्रक्रिया के बारे में समीर ने सुलेखा को समझा दिया |”

“ लेकिन यह काम वह मन से तो करेगी नहीं, और बेमन से पनपने वाले बच्चे के संस्कार क्या बनेंगे?”

“ जन्म माता-पिता देते हैं, पर बच्चे अपने अतीत के साथ आते हैं, उनके पिछले जन्म के संस्कार भी होते हैं | फिर बच्चों का विकास, उनके पालन-पोषण, शिक्षा-दीक्षा पर भी निर्भर करता है | वैसे तुम देखो, एक ही माता-पिता, एक सा वातावरण, एक जैसी देखभाल, फिर भी एक बच्चा होनहार निकलता है, एक बिलकुल नालायक | एक सुशील, सहृदय, सुसंस्कृत, तो दूसरा संकुचित, मनोवृत्ति वाला, उद्दंड व अहँकारी | एक दस जन्म आगे, एक दस जन्म पीछे |”

 “बच्चा क्या निकलेगा, कैसा होगा, यह तो बाद की बात है | अभी तो यह विचार करना है कि हमें क्या यह कदम उठाना चाहिए? ज़रा शांति के साथ, ठन्डे दिमाग से सोचना, इस विषय में |”
“बस एक सवाल और पूछती हूँ | जिस माँ ने बालक को जन्म दिया, उसे उससे मोह न होगा? वे कैसे खुशी-खुशी उसे दूसरों को दे देगी?”

“ थोड़ा बहुत लगाव तो अवश्य हो जाता होगा मगर ये सेरोगट मदर कहलाती हैं | एक तरह से यह उनका धंधा होता है | जीविका उपार्जन का साधन | कई एक करुणा तथा परोपकार की भावना से भी कोख उधार देती हैं |”

“ और जो बाद में कोई झगड़ा-फसाद हुआ?”

“ कैसे? न माँ को यह मालूम कि उसके गर्भ में किसका बच्चा है, ना यह मालूम कि बच्चा किसको दिया गया है, न पिता को मालूम कि बच्चे की जन्मदात्री कौन है और ना ही बच्चे को कभी बताया जाएगा कि उसकी माँ कौन है, तो फिर झगड़ा कैसे ओर क्यों? और थोड़ा सोच विचार के बाद सुलेखा सहमत हो गई थी |

यथ्समय सूचना दी गई कि घर में सभी की प्रोन्नति होने वाली है | दादी माँ पर-दादी बनने वाली हैं, माँ दादी| बहने बुआ और आरुषि दीदी | दादाजी बड़े दादा और पापाजी बड़े पापा तो बन ही जायेंगे | घर में खुशी की लहर दौड़ गई | तत्काल समाचार भेजा गया कि सुलेखा की देख-भाल के लिए माँ कश्मीर पहुँच रहीं हैं |

“ नहीं, समीर ने जवाब दिया | यहाँ ठण्ड बहुत है, माँ बीमार पड़ जायेंगी | सुलेखा की  देखभाल अच्छी हो रही है | प्रवासकाल निकट आया तो भाभी ने प्रोग्राम बनाया पर समीर ने उन्हें भी रोक दिया | आर्मी अस्पताल में किसी को कुछ करने की ज़रूरत ही नहीं होती बल्कि वहाँ कोई जा ही नहीं पाता | फिर क्यों तकलीफ की जाए?”

और यथासमय सुंदर सा प्यार बेटा सुलेखा की गोद में आ गया | गाड़ी भागी जा रही थी दक्षिण की ओर | सुलेखा ने देखा सजल गहरी नींद में बर्थ पर सोया हुआ था | सुलेखा सोच रही थी कितना अंतर है पिछली यात्रा में और इस यात्रा में| तब उसका मन कितना अवसाद भरा था, लितना खिज्ज | आज वे कितनी तृप्त है, कितनी संतुष्ट | गाड़ी की गति धीमी होने लगी थी सो | समीर उतर कर उसकी बगल में बैठ गया था | इस बीच सजल भी कुनमुनाने लगा तो दोनों थापकियाँ देकर उसे फिर से सुलाने का उपक्रम करने लगे पर उसकी नींद पूरी हो गई थी | सुलेखा ने उसे गोद में ले लिया और समीर उससे खेलने लगा| सुलेखा ने आनंद मिश्रित स्वर में कहा, “माँ कह रही थी सजल तुम पर गया है और दादी का कहना था मुझपर |”

“ किसी पर गया हो, बेटा तो हम दोनों का हैं ना?”

“हाँ समीर, उस अनजान सेरोगट मदर को हमारा शतशत प्रणाम, कोटिश धन्यवाद जिसने हमारी नीरस, वीरान जिंदगी को खुशहाल बना दिया| न केवल जीवन को मधुर व सरस बनाया बल्कि संपूर्णता का एहसास भी दिला दिया|” समीर ने समर्थन में कहा|

“ उसके और उसके परिवार के प्रति तथा एसी अन्य माताओं के प्रति हमारी अनेकानेक शुभकामनाएं|”

 और दोनों ने सजल को भावविभोर हो चूम लिया |||                               

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